9 से शाम 5 की नौकरी, गोद में 6 महीने की बेटी…दूसरे प्रयास में बनीं SDM

सुबह की नौकरी, शाम को परिवार की जिम्मेदारी और गोद में छह महीने की बच्ची। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए घंटों किताबों के सामने बैठने का समय शायद ही कभी मिला हो। लेकिन बिहार की प्रीति कुमारी ने परिस्थितियों को अपनी मंजिल के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। नौकरी करते हुए, मां बनने के बाद और शादी के बाद बदली जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा पास की और राज्य में 166वीं रैंक हासिल कर उपखंड अधिकारी (SDM) बनने का रास्ता तय किया।
प्रीति की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनकी सफलता किसी एक परीक्षा के दिन की कहानी नहीं है। इसके पीछे वह दौर भी है जब पहली कोशिश में प्रारंभिक परीक्षा के बाद वह आगे नहीं बढ़ सकीं। उस असफलता के बाद उन्होंने तैयारी छोड़ी नहीं, बल्कि अपनी रणनीति बदली। दूसरी कोशिश में वही बदलाव उनकी सफलता की वजह बना।
और इस पूरी यात्रा में एक और तस्वीर है जो उनकी कहानी को सिर्फ परीक्षा की सफलता से कहीं आगे ले जाती है—BPSC इंटरव्यू के लिए पहुंची प्रीति की गोद में छह महीने की बेटी थी।
नौकरी के साथ शुरू हुई दूसरी तैयारी
प्रीति करीब तीन वर्षों तक सरकारी शिक्षिका के रूप में काम कर चुकी थीं। उनकी दिनचर्या में नौकरी के तय घंटे थे और उसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां। शादी के बाद जिम्मेदारियां और बढ़ीं। वर्ष 2023 में उनकी शादी मुजफ्फरपुर जिले में हुई। उनके पति निजी कंपनी में अधिकारी हैं और फिलहाल पटना में एरिया मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।
ऐसे समय में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का पारंपरिक तरीका—घंटों लगातार पढ़ना, लंबे study sessions और एक तय timetable—उनके लिए व्यावहारिक नहीं था। इसलिए प्रीति ने अपनी तैयारी का तरीका ही बदल दिया।
उनका तरीका सीधा था—जितना समय मिले, उसी को पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करो।
यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन नौकरी और परिवार के बीच प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होती है। पढ़ाई के लिए आठ-दस घंटे लगातार उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में समय की मात्रा से ज्यादा उसकी निरंतरता मायने रखने लगती है।
पहली कोशिश में मिली असफलता
प्रीति की BPSC यात्रा पहली कोशिश में सफल नहीं हुई। उन्होंने परीक्षा दी, लेकिन प्रारंभिक चरण के बाद आगे नहीं बढ़ सकीं।
यहीं से उनकी कहानी का दूसरा हिस्सा शुरू होता है।
असफलता के बाद उन्होंने उसी रणनीति को दोहराने के बजाय अपनी तैयारी पर दोबारा काम किया। उनकी समझ में आया कि सिर्फ ज्यादा घंटे पढ़ना पर्याप्त नहीं है। तैयारी में उपलब्ध समय का बेहतर इस्तेमाल करना, कमजोर हिस्सों पर काम करना और लगातार पढ़ाई से जुड़े रहना ज्यादा जरूरी है।
दूसरे प्रयास में उन्होंने इसी रणनीति के साथ परीक्षा दी।
इस बार परिणाम उनके पक्ष में था।
166वीं रैंक और SDM बनने का सपना
BPSC 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में प्रीति ने पूरे राज्य में 166वीं रैंक हासिल की। जिस लक्ष्य के लिए उन्होंने नौकरी, परिवार और मातृत्व के बीच समय निकाला था, वह आखिरकार हासिल हो गया।
सरकारी शिक्षिका से प्रशासनिक अधिकारी बनने का यह बदलाव सिर्फ पद बदलने की कहानी नहीं है। यह उस तैयारी की परिणति है जो उनकी जिंदगी की बदलती परिस्थितियों के बीच लगातार चलती रही।
प्रीति के लिए परीक्षा की तैयारी किसी अलग दुनिया में बैठकर की गई तैयारी नहीं थी। वह उसी समय नौकरी कर रही थीं, परिवार संभाल रही थीं और मां भी बन चुकी थीं।
इंटरव्यू के दिन गोद में बच्ची
इस कहानी का सबसे मानवीय पहलू BPSC इंटरव्यू से जुड़ा है।
प्रीति के पिता नंदकिशोर प्रसाद के मुताबिक, जब वह BPSC इंटरव्यू के लिए पहुंची थीं, तब उनकी छह महीने की बेटी भी उनके साथ थी। नंदकिशोर प्रसाद खुद नवोदय विद्यालय, कोडरमा में शिक्षक हैं।
एक तरफ बेटी की देखभाल और दूसरी तरफ जीवन के एक बड़े करियर मोड़ का इंटरव्यू। यह तस्वीर बताती है कि प्रीति की तैयारी को किसी एक कमरे, किताब या परीक्षा केंद्र में बांधकर नहीं देखा जा सकता।
उनकी तैयारी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी के बीच चल रही थी।
और यही इस सफलता को दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की सामान्य success stories से अलग बनाता है।
JNV से JNU तक का सफर
अफसर बनने से पहले प्रीति की शैक्षणिक यात्रा भी लगातार आगे बढ़ने वाली रही है। उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई जवाहर नवोदय विद्यालय, दरभंगा से की। इसके बाद भुवनेश्वर के रीजनल कॉलेज से BSc और BEd की डिग्री हासिल की।
फिर वह दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचीं, जहां उन्होंने Life Science में MSc किया।
इसके बाद उन्होंने करीब तीन वर्षों तक नवोदय विद्यालय और दिल्ली में सरकारी शिक्षिका के तौर पर काम किया।
यानी प्रशासनिक सेवा में पहुंचने से पहले उनका करियर शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा रहा। शिक्षक के रूप में काम करने का अनुभव और फिर प्रशासनिक जिम्मेदारी की ओर बढ़ना उनके पेशेवर सफर का एक बड़ा बदलाव भी है।
परिवार बना तैयारी का सहारा
प्रीति खुद अपनी सफलता में परिवार के सहयोग को महत्वपूर्ण मानती हैं। नौकरी और बच्ची की जिम्मेदारी के साथ तैयारी जारी रखना आसान नहीं था। ऐसे में पति और परिवार का समर्थन उनके लिए तैयारी का आधार बना।
उनके पति निजी क्षेत्र में अधिकारी हैं और पटना में एरिया मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। नौकरी के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को साझा करने में मिला सहयोग प्रीति के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि उनकी तैयारी का समय परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता था।
प्रीति की कहानी में इसलिए सिर्फ “उन्होंने मेहनत की” कहना अधूरा होगा। उन्होंने मेहनत जरूर की, लेकिन उस मेहनत को लगातार जारी रखने के लिए परिवार का भरोसा और सहयोग भी जरूरी था।
घर में पढ़ाई का माहौल
प्रीति तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनकी मां अनिता कुमारी गृहिणी हैं। परिवार में शिक्षा को लेकर एक मजबूत माहौल दिखाई देता है।
उनकी छोटी बहन UPSC की तैयारी कर रही हैं, जबकि उनके भाई ने NEET परीक्षा पास की है।
प्रीति का मायका नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड के भोरमबाग में है। एक छोटे कस्बाई परिवेश से निकलकर जवाहर नवोदय विद्यालय, भुवनेश्वर, JNU, सरकारी शिक्षिका और फिर BPSC के जरिए SDM बनने तक का सफर बताता है कि उनकी सफलता किसी एक परीक्षा की तैयारी से नहीं बनी। यह कई वर्षों में तैयार हुई शैक्षणिक और पेशेवर यात्रा का परिणाम है।
असली सबक घंटों का नहीं, निरंतरता का
प्रीति की कहानी को अगर सिर्फ “नौकरी के साथ BPSC पास किया” कह दिया जाए तो उसका सबसे जरूरी हिस्सा छूट जाएगा।
उनकी पहली कोशिश सफल नहीं हुई। शादी के बाद परिस्थितियां बदलीं। नौकरी बनी रही। फिर मातृत्व आया। पढ़ाई के लिए उपलब्ध समय और कम हुआ। लेकिन उन्होंने अपनी मंजिल नहीं बदली। उन्होंने तैयारी का तरीका बदला।
यही उनकी कहानी का सबसे मजबूत सबक है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में तैयारी के लिए उपलब्ध समय हर अभ्यर्थी के पास बराबर नहीं होता। किसी के पास पूरा दिन है, किसी के पास नौकरी के बाद कुछ घंटे, किसी के पास परिवार की जिम्मेदारियों के बीच बचे हुए छोटे-छोटे समय। प्रीति की सफलता यह दिखाती है कि सीमित समय में भी निरंतर तैयारी और कमजोरियों पर लगातार काम किया जाए तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है।
एक असफल प्रयास से दूसरी जिंदगी तक
प्रीति की यात्रा में पहली असफलता अंत नहीं बनी। वह उनकी रणनीति बदलने का बिंदु बनी।
आज BPSC में 166वीं रैंक के साथ SDM बनने जा रहीं प्रीति के पीछे सिर्फ एक सफल परीक्षा परिणाम नहीं है। इसके पीछे सुबह की नौकरी है, घर की जिम्मेदारियां हैं, शादी के बाद बदली दिनचर्या है, छह महीने की बच्ची है, पहला असफल प्रयास है और उसके बाद खुद को दोबारा तैयार करने का फैसला है।
कभी-कभी प्रतियोगी परीक्षा की सबसे कठिन तैयारी किताबों से बाहर होती है—जब समय कम हो, जिम्मेदारियां ज्यादा हों और फिर भी अगले दिन दोबारा पढ़ने बैठना हो।
