बेटी से रेप के आरोप में उम्रकैद, फिर हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

एक पिता पर अपनी ही बेटी के साथ रेप का आरोप लगा। मामला POCSO की धाराओं तक पहुंचा। वाराणसी की विशेष अदालत ने आरोपों को इतना गंभीर माना कि डॉक्टर और उसके भाई को उम्रकैद सुना दी। एक सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डेढ़ साल से ज्यादा समय जेल में रहा। लेकिन जब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के सामने पहुंचा तो कहानी का वह हिस्सा सामने आया, जो ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद दब गया था—क्या यह वास्तव में बच्ची के साथ यौन अपराध का मामला था या पति-पत्नी के बीच चल रहे संपत्ति विवाद ने एक बच्चे को कानूनी लड़ाई का केंद्र बना दिया था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की दोबारा पड़ताल के बाद डॉक्टर और उसके भाई की उम्रकैद रद्द कर दी। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने अभियोजन की कहानी को साक्ष्यों की कसौटी पर परखा और आरोपों को साबित करने के लिए उपलब्ध सामग्री को अपर्याप्त माना। अदालत की टिप्पणी का सबसे गंभीर हिस्सा POCSO कानून के कथित दुरुपयोग को लेकर था। कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में पारिवारिक और संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करके केवल आरोप और बच्ची के बयान के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखना न्यायसंगत नहीं था।

यह फैसला सिर्फ एक डॉक्टर की रिहाई की कहानी नहीं है। यह उस बिंदु पर रोशनी डालता है जहां बाल सुरक्षा का कानून, परिवार की अंदरूनी लड़ाई और आपराधिक न्याय व्यवस्था एक-दूसरे से टकराते हैं।

शुरुआत अस्पताल और संपत्ति के विवाद से

मामले की जड़ उस पारिवारिक विवाद में थी जो डॉक्टर और उनकी पत्नी के बीच अस्पताल निर्माण और संपत्ति को लेकर चल रहा था। दोनों के बीच रिश्ते बिगड़े और विवाद धीरे-धीरे निजी झगड़े से कानूनी लड़ाई में बदल गया। 2018 में पत्नी ने वाराणसी में डॉक्टर और उनके भाई के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

आरोप बेहद गंभीर था। शिकायत के मुताबिक, बेटी जब अपने पिता के साथ उत्तराखंड गई थी, तब उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया। यही आरोप आगे POCSO मुकदमे का आधार बना।

लेकिन मुकदमे की पूरी दिशा इस बात से तय नहीं हुई कि आरोप कितना गंभीर था। असली सवाल यह था कि क्या अभियोजन के पास ऐसा विश्वसनीय और स्वतंत्र साक्ष्य था, जिसके आधार पर दो लोगों को जीवनभर जेल भेजा जा सके?

वाराणसी की विशेष POCSO अदालत ने अभियोजन के पक्ष में फैसला दिया। डॉक्टर और उनके भाई को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा हुई। यहीं से एक डॉक्टर के लिए कानून की सबसे कठोर प्रक्रिया शुरू हो गई।

डेढ़ साल जेल, फिर कहानी ने मोड़ लिया

डॉक्टर जेल में था। निचली अदालत का फैसला उसके खिलाफ था। लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में ट्रायल कोर्ट का फैसला अंतिम पड़ाव नहीं होता। दोषसिद्धि के खिलाफ अपील में हाईकोर्ट को पूरे रिकॉर्ड को दोबारा परखने का अधिकार होता है। और इस मामले में यही हुआ।

हाईकोर्ट ने आरोपों को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वे POCSO जैसे गंभीर कानून के तहत लगाए गए थे। पीठ ने घटनाक्रम, शिकायत में हुई देरी, पारिवारिक विवाद, बच्ची के बयान और उपलब्ध अन्य सामग्री को एक साथ रखकर देखा।

यहीं अभियोजन की कहानी में अदालत को ऐसी दरारें दिखाई दीं, जिन्हें नजरअंदाज करना संभव नहीं था।

दो महीने की देरी ने बदला सवाल

मामले में कथित घटना और FIR दर्ज होने के बीच करीब दो महीने का अंतर था। शिकायतकर्ता की ओर से इस देरी की वजह परिवार की प्रतिष्ठा बचाना बताई गई थी। लेकिन हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी फर्क समझना जरूरी है। यौन अपराध की शिकायत में देरी अपने आप आरोप को झूठा साबित नहीं करती। सामाजिक दबाव, परिवार का डर, बच्चे की सुरक्षा और बदनामी जैसी वजहों से शिकायत देर से भी हो सकती है।

लेकिन इस मामले में अदालत ने देरी को अकेले नहीं देखा। उसे उस पूरे विवाद के साथ पढ़ा गया जो पति-पत्नी के बीच पहले से चल रहा था।

यानी अदालत का सवाल सिर्फ यह नहीं था कि FIR दो महीने बाद क्यों हुई। सवाल यह था कि उस देरी की वजह और परिवार के भीतर चल रहे विवाद के बीच क्या संबंध था?

हाईकोर्ट ने अभियोजन की बताई वजह को स्वीकार नहीं किया और देरी को मामले की विश्वसनीयता पर असर डालने वाली परिस्थिति माना।

बच्ची की गवाही पर अदालत ने क्यों लगाया ब्रेक?

POCSO मामलों में बच्चे का बयान बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन अदालत ने यहां एक और कठिन सवाल उठाया—क्या बच्चा हमेशा स्वतंत्र रूप से वही बोल रहा होता है जो उसने स्वयं अनुभव किया?

हाईकोर्ट ने कहा कि जब माता-पिता के बीच गंभीर विवाद हो और बच्चा लगातार किसी एक अभिभावक के प्रभाव में रहे, तो यह संभावना जांचना जरूरी है कि उसकी सोच और बयान पर बाहरी प्रभाव तो नहीं पड़ा। यही इस फैसले का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।

अदालत ने broadly यह माना कि बच्चा किसी बात को बार-बार सुनते-सुनते उसे सच मान सकता है। यानी बच्चे की उम्र उसकी गवाही को महत्वपूर्ण बनाती है, लेकिन अदालत को यह भी देखना पड़ता है कि उस गवाही के पीछे स्वतंत्र अनुभव है या किसी वयस्क का प्रभाव।

इस मामले में हाईकोर्ट ने बच्ची के बयान को बाकी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से अलग करके देखने से इनकार किया।

और यहीं ट्रायल कोर्ट की कहानी और अपीलीय अदालत की कहानी अलग होती दिखाई दी।

तस्वीरें भी बनीं साक्ष्य की कड़ी

मामले में पिता और बेटी की पुरानी तस्वीरें अदालत के सामने रखी गईं। तस्वीरों में बच्ची पिता के साथ सहज और स्नेहपूर्ण दिखाई दे रही थी।

हाईकोर्ट ने इन तस्वीरों को भी रिकॉर्ड की बाकी सामग्री के साथ देखा। अब यहां सनसनी फैलाना आसान है—“तस्वीरों ने रेप का आरोप झूठा साबित कर दिया।” लेकिन अदालत की reasoning को इस तरह सरल करना गलत होगा।

किसी पिता और बेटी की सामान्य पारिवारिक तस्वीर अपने आप किसी अपराध को न साबित करती है, न खारिज। तस्वीर की अहमियत उस पूरे evidentiary matrix में थी, जिसे हाईकोर्ट जांच रहा था।

अदालत ने इसे बच्ची की गवाही, पारिवारिक विवाद और दूसरे तथ्यों के साथ रखकर देखा। जब सारी परिस्थितियां एक साथ रखी गईं तो पीठ अभियोजन की कहानी को विश्वसनीय मानने की स्थिति में नहीं रही।

यही वह बिंदु था जहां मामला सिर्फ “किसने क्या कहा” से निकलकर “किस बात का प्रमाण क्या है” में बदल गया।

कोर्ट ने संपत्ति विवाद को क्यों गंभीरता से लिया?

किसी POCSO मुकदमे में संपत्ति विवाद का होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि यौन अपराध का आरोप झूठा है।

लेकिन अगर अभियोजन की कहानी के पीछे पहले से चला आ रहा पारिवारिक संघर्ष हो, शिकायत में असामान्य देरी हो और गवाही की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठें, तो अदालत उस विवाद की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकती। इस मामले में हाईकोर्ट ने यही किया।

अदालत के निष्कर्ष के अनुसार, पति-पत्नी के बीच संपत्ति और अस्पताल को लेकर चल रहा विवाद इस मुकदमे की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण था। पीठ इस निष्कर्ष तक पहुंची कि बच्ची को माता-पिता के संघर्ष में इस्तेमाल किया गया और उसके आधार पर लगाया गया यौन उत्पीड़न का आरोप विश्वसनीय नहीं था।