X पोस्ट ने पार किया सिस्टम, नेतन्याहू के भाषण तक पहुंचा फर्जी ईरानी बयान

5 अगस्त की सुबह भारत से निकली एक सोशल मीडिया पोस्ट को शायद उस वक्त किसी ने खास महत्व नहीं दिया होगा। उसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी के नाम से एक कथित बयान था। दावा गंभीर था—ईरान तब तक परमाणु हथियार बनाने की कोशिश जारी रखेगा, जब तक अमेरिका और इजरायल के पास परमाणु हथियार हैं।
बयान की कोई विश्वसनीय पुष्टि नहीं हुई थी। वाहिदी के किसी आधिकारिक बयान, ईरानी सरकारी स्रोत या भरोसेमंद रिकॉर्ड में इसकी पुष्टि नहीं मिली। ईरान के परमाणु हथियार विकसित कर लेने का भी कोई प्रमाण सामने नहीं आया था। लेकिन इंटरनेट पर किसी दावे को आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रमाण की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी उसे सिर्फ अगला अकाउंट चाहिए होता है।
करीब दो घंटे बाद वही कथित उद्धरण एक दूसरे भारतीय अकाउंट पर दिखाई दिया। अब यह सिर्फ एक पोस्ट नहीं था। एक ही बात दो जगह दिखाई दे रही थी। फिर उसने भारत की सीमा पार की और इजरायली सोशल मीडिया अकाउंट्स तक पहुंच गई।
कुछ ही घंटों में जिस दावे का मूल स्रोत एक सोशल मीडिया पोस्ट था, उसके सामने ऐसे नाम आने लगे जिनकी राजनीतिक और मीडिया पहुंच कहीं ज्यादा बड़ी थी। यहीं से इस कहानी का असली सवाल शुरू होता है—किसी ने यह पूछा ही नहीं कि वाहिदी ने यह बात वास्तव में कब, कहां और किस मंच पर कही थी?
पहला पड़ाव भारत था
5 अगस्त को भारत स्थित एक X अकाउंट ने वाहिदी के नाम से कथित बयान पोस्ट किया। उपलब्ध सामग्री में यही इसका पहला ज्ञात सामने आना बताया गया है।
करीब दो घंटे बाद एक अन्य भारतीय अकाउंट ने उसी कथन को दोहराया। इस दूसरे पोस्ट का महत्व इसलिए था क्योंकि उसने दावे को एक और डिजिटल नेटवर्क में पहुंचा दिया। अब आगे की amplification के लिए किसी नए तथ्य की जरूरत नहीं थी; वही पुराना कथन पर्याप्त था।
यहीं सोशल मीडिया की एक बुनियादी समस्या सामने आती है। किसी दावे का दो अकाउंट्स पर दिखाई देना उसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होता। लेकिन देखने वाले के लिए दोनों पोस्ट अलग स्रोत जैसे लग सकते हैं, जबकि दोनों के पीछे एक ही अपुष्ट मूल सामग्री हो सकती है।
इस मामले में आगे जो हुआ, उसने इसी भ्रम को कई गुना बड़ा कर दिया।
फिर नाम ने असर किया
दावे को इजरायली सोशल मीडिया के प्रमुख अकाउंट्स ने उठाया। इनमें “Mossad Commentary” नाम का अकाउंट भी था। नाम ऐसा था जो पहली नजर में इजरायल की खुफिया एजेंसी से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन उपलब्ध सामग्री के मुताबिक उसका Mossad से कोई ज्ञात संबंध नहीं है।
अकाउंट ने कथित बयान को इस दावे के समर्थन में इस्तेमाल किया कि तेहरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं से पीछे नहीं हट रहा, बल्कि बातचीत के जरिए समय हासिल कर रहा है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि यहां भी मूल सवाल का जवाब नहीं मिला था। वाहिदी ने कथित तौर पर यह बात कही कहां थी—इसका प्रमाण सामने नहीं आया। लेकिन अब दावे के साथ एक नया संदर्भ जुड़ चुका था: ईरान का परमाणु कार्यक्रम।
यानी एक अपुष्ट उद्धरण को एक राजनीतिक narrative मिल गया था।
टीवी ने दावे को नया वजन दिया
इसके बाद कथित बयान इजरायल के चैनल 14 तक पहुंचा। वहां इसे ईरान की ओर से परमाणु बम की दिशा में आगे बढ़ने की पहली सार्वजनिक स्वीकारोक्ति के रूप में पेश किया गया।
यह वह मोड़ था जहां कहानी की प्रकृति बदल गई।
सोशल मीडिया पर किसी अनजान अकाउंट की पोस्ट को नजरअंदाज करना आसान है। लेकिन वही बात जब टेलीविजन पर दिखाई देती है तो आम दर्शक के लिए उसकी विश्वसनीयता का स्तर बदल जाता है। भले ही मूल स्रोत वही क्यों न हो।
इस कथित उद्धरण के साथ भी यही हुआ। उसका स्रोत मजबूत नहीं हुआ था, लेकिन उसकी दिखने वाली हैसियत जरूर बढ़ गई थी।
अंग्रेजी भाषा में चैनल की पोस्ट को सैकड़ों हजारों व्यूज मिले। दावा अब इजरायली डिजिटल दर्शकों के बड़े हिस्से तक पहुंच चुका था।
फिर कहानी वहां पहुंची, जहां उसके प्रभाव का दायरा अचानक बहुत बड़ा हो गया।
तीन घंटे से भी कम वक्त में नेतन्याहू तक
कथित बयान सामने आने के तीन घंटे से भी कम समय बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यरुशलम के माउंट हर्ज़ल में दिए भाषण में उसी दावे का इस्तेमाल किया।
उन्होंने कहा कि IRGC कमांडर वाहिदी ने उसी दिन ईरान की परमाणु हथियार विकसित करने की मंशा को स्पष्ट किया था।
यही वह क्षण था जब एक सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीतिक वैधता का रूप लेना शुरू कर दिया।
अब किसी व्यक्ति के लिए इस दावे का मूल स्रोत खोजना जरूरी नहीं रह गया था। वह इसे एक प्रधानमंत्री के भाषण में सुन रहा था। एक ऐसा बयान, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं थी, अब आधिकारिक राजनीतिक मंच से बोला जा चुका था।
और यहीं एक सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है—वह कथित उद्धरण प्रधानमंत्री के भाषण तक पहुंचा कैसे?
उपलब्ध सामग्री में नेतन्याहू के प्रवक्ता ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि कथित उद्धरण भाषण में कैसे शामिल हुआ। प्रवक्ता ने इसके बजाय ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नेतन्याहू की लंबे समय से चली आ रही चेतावनियों का बचाव किया।
लेकिन सवाल उद्धरण की राजनीतिक स्थिति का नहीं था। सवाल उसकी उत्पत्ति और सत्यापन का था।
अब बारी अमेरिका की थी
नेतन्याहू के भाषण के बाद इस कथित बयान की यात्रा अटलांटिक पार कर अमेरिका पहुंच गई।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने इसे दोबारा पोस्ट किया। उनके संदेश का सार था कि ईरान आखिरकार उस बात को स्वीकार कर रहा है जिसे वह वर्षों से स्पष्ट मानते रहे हैं।
रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट ने भी दावा साझा किया।
अब वही कथित बयान अमेरिकी राजनीतिक विमर्श में प्रवेश कर चुका था। जिस सामग्री की शुरुआत भारत के एक X अकाउंट से हुई थी, वह अब अमेरिकी नीति से जुड़े प्रभावशाली लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट का हिस्सा बन चुकी थी।
इसके बाद अमेरिकी टेलीविजन तक इसकी पहुंच हुई।
टीवी पर सवाल नहीं, विश्लेषण शुरू हो गया
फॉक्स न्यूज पर एंकर बिल हेमर ने कथित उद्धरण का इस्तेमाल करते हुए पूर्व अमेरिकी सेंट्रल कमांड प्रमुख जनरल जोसेफ वोटेल से बातचीत की। उद्धरण को ईरान की तरफ से परमाणु हथियारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति के करीब बताया गया।
यहां तक आते-आते मूल पोस्ट लगभग कहानी से गायब हो चुका था।
दर्शक के सामने अब भारत का कोई X अकाउंट नहीं था। सामने इजरायली टीवी था, इजरायल के प्रधानमंत्री का बयान था, अमेरिकी राजदूत का पोस्ट था, एक अमेरिकी सीनेटर की amplification थी और फिर अमेरिकी टीवी पर उस कथन की चर्चा थी।
दावे को कोई नया सबूत नहीं मिला था। उसे सिर्फ नए और ज्यादा प्रभावशाली मंच मिलते गए थे।
यही इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिर कहानी उलटी दिशा में चली
जैसे-जैसे पत्रकारों और शोधकर्ताओं ने कथित बयान की जांच शुरू की, समस्या सामने आने लगी। वाहिदी के इस कथन का कोई विश्वसनीय ईरानी स्रोत नहीं मिला।
माइक वॉल्ट्ज की पोस्ट बाद में हट गई। इसे क्यों हटाया गया, इसकी कोई वजह सामने नहीं आई।
फिर अमेरिकी टेलीविजन पर भी स्थिति बदली। फॉक्स न्यूज ने दर्शकों को बताया कि उद्धरण असत्यापित और गलत था और प्रसारण में हुई गलती पर खेद जताया।
यानी जिस दावे को कुछ घंटे पहले ईरान की परमाणु नीति के संभावित निर्णायक संकेत की तरह देखा जा रहा था, वह अब स्वयं सत्यापन के सवाल में फंस चुका था।
लेकिन तब तक वह कई महत्वपूर्ण मंच पार कर चुका था।
टाइमिंग ने इसे और खतरनाक बनाया
इस घटना को उसके समय से अलग करके देखना मुश्किल है। यह मामला ऐसे वक्त सामने आया जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध अपने छठे महीने में प्रवेश कर चुका था और बातचीत की संभावना को लेकर भी तनाव बना हुआ था।
कथित बयान के वायरल होने से तीन दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप ने शांति वार्ता के लिए जगह बनाने के उद्देश्य से ईरान पर हमले रोकने की बात कही थी।
ऐसे समय में IRGC के शीर्ष कमांडर के नाम से परमाणु हथियार विकसित करने की कथित स्वीकारोक्ति का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा हो सकता था। अगर बयान वास्तविक होता तो यह उन लोगों के लिए मजबूत तर्क बन सकता था जो ईरान के साथ बातचीत के खिलाफ थे।
यही वजह है कि यह मामला सिर्फ “एक गलत सोशल मीडिया पोस्ट” का मामला नहीं रह जाता।
क्लेमसन यूनिवर्सिटी के मीडिया फॉरेंसिक्स हब के डैरेन एल. लिनविल ने इस कथित बयान को शांति वार्ता के बीच दरार पैदा करने के उद्देश्य से तैयार किए गए दावे के रूप में देखा। लेकिन इसे किसने बनाया, इसका जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
ईरान ने इसके लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन उपलब्ध सामग्री के मुताबिक इस आरोप के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया गया।
इसे कहते हैं नैरेटिव लॉन्ड्रिंग
फैक्ट-चेकिंग की भाषा में इस घटनाक्रम को “नैरेटिव लॉन्ड्रिंग” के उदाहरण के तौर पर देखा गया है।
इसका तरीका सीधा है, लेकिन असर गहरा।
एक संदिग्ध दावा किसी छोटे या अपुष्ट स्रोत से निकलता है। दूसरा अकाउंट उसे दोहराता है। फिर कोई ज्यादा प्रभावशाली अकाउंट उसे उठाता है। मीडिया उसे प्रसारित करता है। उसके बाद कोई राजनीतिक नेता उसी बात को सार्वजनिक रूप से कह देता है।
