एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा, नारे के पीछे क्या है मांग

दिल्ली के एक पार्क में 17 साल की नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म और बिहार के जमुई तथा समस्तीपुर में बच्चियों से छेड़छाड़ की वारदातें महज अपराध की खबरें नहीं हैं। ये उस खोखली व्यवस्था के सामने खड़े किए गए वे ज्वलंत सवाल हैं, जिनका जवाब एसी कमरों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में देना भले ही आसान हो, लेकिन जमीन पर हकीकत बेहद डरावनी है।
इन घटनाओं के विरोध में जब दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की छात्राएं सड़कों पर उतरीं, तो उनके नारों ने सीधे समाज की चेतना पर चोट की। ABVP से लेकर NSUI तक के बैनर तले एक साथ आई इन छात्राओं ने साबित कर दिया कि जब लड़कियों के सब्र का बांध टूटता है, तो समाज का साइलेंसर भी फट जाता है।
कचौड़ी, समोसा और समाज की मानसिकता
सड़कों पर गूंजा नारा— “एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।” सुनने में यह भले ही हास्यपद लगे और नाश्ते की दुकान पर रखे समोसे भी अपना कसूर ढूंढने लगें, लेकिन इस नारे की असली चोट उस मानसिकता पर है जहां लड़की को सुरक्षा चाहिए और समाज उसे केवल “सावधान रहने” का ज्ञान बांटकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।
दर्द सिर्फ सिर का नहीं, खौफ का है
“मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है।” यह नारा सुनकर मेडिकल साइंस भी शायद कुछ देर के लिए सुन्न रह जाए, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि यहां “दर्द” सिर्फ शारीरिक नहीं है। यह वह डर, गुस्सा और लगातार असुरक्षित महसूस करने का दर्द है, जिसका इलाज कोई पेनकिलर नहीं कर सकता।
इसी व्यंग्य को आगे बढ़ाता है एक और नारा— “ओ पुरुष, कल आना।” जिस समाज में महिलाओं को बराबरी की बात करते हुए भी कदम-कदम पर अपनी सुरक्षा का प्रमाण देना पड़े, वहां “कल आना” व्यवस्था पर एक करारा तंज है। यह बताता है कि न्याय की तारीख और सुरक्षा की तारीख हमारे सिस्टम के कैलेंडर पर कभी एक साथ नहीं मिलतीं।
आजादी पर पहरा और पर्दों का गणित
“हमारी आजादी से जिसको दर्द है, वो सब नामर्द है।” यह नारा एक सीधी बहस छेड़ता है कि किसी लड़की के कपड़े, आवाज, दोस्ती, पढ़ाई, नौकरी या रात में बाहर निकलने का ठेका आखिर किसके पास है? सवाल यह होना चाहिए कि किसी लड़की की आजादी किसी अपराधी के लिए चुनौती क्यों बन जाती है।
इसी से जुड़ा एक और सीधा सवाल छात्राओं ने दागा— “शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में।” अपराध पुरुष करे और पर्दा महिला करे? अपराधी खुलेआम सड़क पर घूमे और लड़की को घर में कैद रहने की सलाह मिले? यह सामाजिक गणित इतना उलटा है कि कोई भी गणित का शिक्षक इसे हल करने से इनकार कर दे।
व्यवस्था को आईना: ‘रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’
सबसे ज्यादा चुभने वाला और व्यवस्था की पोल खोलने वाला नारा है— “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं।” इस एक लाइन में पूरे समाज का पाखंड छिपा है। रात में बाहर निकलने पर लड़की को ‘जल्दी घर आने’ की सलाह दी जाती है, अकेले जाने पर ‘किसी को साथ ले जाने’ को कहा जाता है, कपड़े बदलने पर ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर दिखाया जाता है। लेकिन किसी अपराधी का कॉलर पकड़कर यह कोई नहीं कहता कि “तुम अपराध मत करना।”
समोसे गर्म करने से पहले, समाज की ‘शर्म’ गर्म करने की जरूरत
“फूल नहीं, चिंगारी है, ये भारत की नारी है।” और “ठंडे समोसे गर्म करो, मर्द जात शर्म करो।” ये नारे बताते हैं कि महिलाएं हर वक्त लड़ना नहीं चाहतीं, लेकिन लगातार दबाए गए सवाल चिंगारी बनकर फूटते ही हैं। हर ऐसी घटना के बाद कुछ दिन मोमबत्तियां जलती हैं, सोशल मीडिया पर हैशटैग चलते हैं, नेता आश्वासन देते हैं और फिर देश अगली खबर की ओर बढ़ जाता है। लेकिन उस पीड़िता के लिए यह कोई “अगली खबर” नहीं होती; यह उसकी जिंदगी का वह पन्ना बन जाता है, जिसे कोई डिलीट बटन नहीं मिटा सकता।
इन छात्राओं के नारों को सिर्फ मजेदार पंचलाइन समझकर नजरअंदाज करना बहुत आसान है, लेकिन मुश्किल यह समझना है कि इन शब्दों के पीछे कितना आक्रोश जमा है। लड़कियां आजादी मांग रही हैं, समाज उन्हें सावधानी का पाठ पढ़ा रहा है, व्यवस्था सुरक्षा का झूठा आश्वासन दे रही है और अपराधी इन सबके बीच अपना काम कर रहे हैं। अब सवाल यह नहीं है कि लड़कियां इतने तीखे नारे क्यों लगा रही हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि उन्हें सड़क पर उतरकर यह सब कहने की नौबत ही क्यों आई?

