टैरिफ से लेकर H-1B वीजा तक, ट्रंप की हार भारत के लिए क्यों अहम?

अमेरिका के 2026 के मध्यावधि (Midterm) चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। विपक्षी डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट) पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है। इसे राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ एक सीधा जनादेश माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव से पहले उन्होंने वोटर्स से अपील की थी कि वे इस चुनाव को उनके खुद के मैदान में होने जैसा मानकर वोट दें।
चुनाव में हार के बाद खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने इसके लिए अपने द्वारा शुरू की गई ईरान की जंग और उसकी वजह से बढ़े तेल व गैस के दामों को जिम्मेदार ठहराया है। जीवन-यापन की बढ़ती लागत, भारी-भरकम टैरिफ और इस युद्ध के कारण अमेरिकी जनता में गहरा असंतोष था, जिसका सीधा फायदा विपक्षी पार्टी को मिला।
अब सवाल यह उठता है कि अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने से भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? आइए इसे व्यापार, टैरिफ और वीजा जैसे अहम मुद्दों के जरिए समझते हैं।
1. व्यापार और टैरिफ नीतियों पर असर
अमेरिका भारतीय सामानों के निर्यात के लिए एक बहुत बड़ा बाजार है, इसलिए वहां की टैरिफ नीतियों में होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ता है। इस साल फरवरी में दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पेश की थी, जिसके तहत अमेरिका ने भारत से आने वाले सामानों पर 18 प्रतिशत का ‘रेसिप्रोकल’ (पारस्परिक) टैरिफ लगाने की बात कही थी। हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दुनिया भर के व्यापारिक सहयोगियों पर टैरिफ लगाने के लिए ट्रंप की आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को खारिज करने के बाद यह टैरिफ घटकर 10 प्रतिशत के आधार स्तर पर आ गया था।
भारत अभी भी अमेरिका के साथ एक पूर्ण व्यापार समझौते (Comprehensive Trade Agreement) के इंतजार में है। इस महीने की शुरुआत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मीडिया को जानकारी दी थी कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अब अंतिम रूप लेने के करीब है। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद आने से ट्रेड डील्स और टैरिफ को लेकर नीतिगत बहस तेज हो सकती है।
2. H-1B वीजा और इमिग्रेशन पर क्या होगा प्रभाव?
अमेरिका के इन चुनावी नतीजों का असर वहां रह रहे भारतीय पेशेवरों और खास तौर पर H-1B वीजा धारकों पर भी पड़ सकता है। संसद पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से भविष्य के इमिग्रेशन कानूनों और उन पर निगरानी रखने के तरीकों में बदलाव की मांग उठ सकती है, हालांकि इससे वीजा नियमों में रातोंरात कोई बड़ा बदलाव आ जाए, ऐसा जरूरी नहीं है।
डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से इमिग्रेशन के नियमों को लेकर संसद की जांच-पड़ताल और सख्ती बढ़ सकती है, साथ ही रिपब्लिकन पार्टी समर्थित कुछ कड़े प्रस्तावों पर रोक भी लग सकती है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस चुनावी नतीजे से राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश अपने आप रद्द नहीं हो जाएंगे। इनमें पिछले साल सितंबर में घोषित किए गए उस नए नियम भी शामिल हैं, जिसमें H-1B वीजा के नए आवेदनों पर 100,000 डॉलर की भारी फीस लगाने का प्रावधान किया गया था।
विदेश नीति और नीतिगत फैसलों की सीमाएं
भले ही डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर कब्जा जमा लिया हो, लेकिन कूटनीति और विदेशी मामलों के मोर्चे पर उनकी नीतिगत गुंजाइश अभी भी सीमित रहेगी। इसकी मुख्य वजह राष्ट्रपति ट्रंप के पास मौजूद ‘वीटो’ (Veto) जैसी व्यापक कार्यकारी शक्तियां, सीनेट का ‘फिलिबस्टर’ नियम (जिसके तहत किसी बिल को पास कराने के लिए 100 में से 60 वोटों की जरूरत होती है) और अर्थव्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि हाउस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने के बावजूद वे राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडे को रोकने के लिए बहुत सीमित दायरे में ही काम कर पाएंगे।

