संभल: इस्लामिक प्रार्थना विवाद में निलंबित शिक्षक को हाईकोर्ट से राहत

उत्तर प्रदेश के संभल जिले से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में अहम घटनाक्रम सामने आए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सरकारी स्कूल में छात्रों से कथित तौर पर इस्लामिक प्रार्थना कराने और उन्हें मुस्लिम पोशाक पहनाने के आरोप में निलंबित किए गए शिक्षक को फौरी राहत दी है। वहीं, उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई एक न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में नवंबर 2024 की संभल हिंसा को एक सोची-समझी साजिश करार दिया गया है।
निलंबन पर रोक, 15 दिन में जांच पूरी करने का निर्देश
जस्टिस मंजू रानी चौहान की अदालत ने 7 सितंबर को ‘मोहम्मद अंजार अहमद बनाम प्रमुख सचिव, बेसिक शिक्षा’ मामले में सुनवाई करते हुए शिक्षक के निलंबन पर जांच पूरी होने तक रोक लगा दी। कोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग को अधिकतम 15 दिनों के भीतर विभागीय जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर आरोपों की गहराई में जाना उचित नहीं होगा, लेकिन जांच के दौरान शिक्षक को अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा मौका मिलेगा।
क्या हैं आरोप और शिक्षक की दलील?
मई में सामने आए इस मामले में आरोप है कि स्कूल में सुबह की प्रार्थना के दौरान अल्लामा इकबाल की नज्म ‘लब पे आती है दुआ’ पढ़वाई गई। साथ ही, छात्राओं को हिजाब और छात्रों को टोपी पहनाई गई। इन आरोपों पर स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक मोहम्मद अंजार अहमद समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था।
हाईकोर्ट में अहमद की ओर से दलील दी गई कि जिस वक्त यह कथित गतिविधि हुई, वह स्वीकृत मेडिकल लीव पर थे। राज्य सरकार ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि घटना के समय शिक्षक स्कूल में मौजूद थे और उन्हें आरोपपत्र दिया जा चुका है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अहमद अपनी मेडिकल लीव के दस्तावेज विभागीय जांच में अपने बचाव के तौर पर पेश कर सकते हैं।
संभल हिंसा पर न्यायिक आयोग का खुलासा
संभल से ही जुड़े दूसरे बड़े मामले में, नवंबर 2024 में हुई हिंसा की जांच कर रहे न्यायिक आयोग ने अपनी 400 पन्नों की रिपोर्ट बुधवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश कर दी। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह हिंसा अचानक नहीं भड़की थी, बल्कि यह पूरी तरह से ‘प्री-प्लांड’ (सुनियोजित) थी।
प्रशासन को क्लीन चिट, सपा नेताओं पर उठे सवाल
आयोग ने अपनी जांच में स्थानीय जिला प्रशासन और पुलिस को क्लीन चिट दे दी है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, सपा नेता सोहैल इकबाल और जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। यह रिपोर्ट राज्य सरकार को पिछले साल अगस्त में ही सौंप दी गई थी, जिसे अब सदन के पटल पर रखा गया है।
