राजस्थान में टिकट का नया खेल, BJP-कांग्रेस नहीं जारी करेंगी लिस्ट

bjp
राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

जयपुर: राजस्थान में आगामी नगर निकाय चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस दोनों ही दलों ने टिकट वितरण की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। स्थानीय स्तर पर टिकट कटने के बाद होने वाले विरोध, असंतोष और बगावत को नियंत्रित करने के लिए दोनों प्रमुख दलों ने ‘सीक्रेट सिंबल’ फॉर्मूला तैयार किया है। इस रणनीति के तहत कई वार्डों में प्रत्याशियों की आधिकारिक सूची सार्वजनिक रूप से जारी करने के बजाय, सीधे चयनित और अधिकृत प्रत्याशी को ही पार्टी का चुनाव चिन्ह (सिंबल) सौंपा जाएगा।

बीजेपी मुख्यालय पर देर रात तक मैराथन बैठकें

चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय पर संभागवार और जिलावार बैठकों का लंबा दौर चला। पहले बीकानेर संभाग और फिर देर रात तक जोधपुर संभाग के निकायों को लेकर गहन मंथन हुआ।

  • इन बैठकों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, प्रदेश संगठन महामंत्री अजय कुमार और निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी मौजूद रहे।

  • महाराष्ट्र से चुनाव समन्वय के लिए आए चंद्रशेखर बावनकुले, अरुण चतुर्वेदी, अविनाश गहलोत, श्रवण सिंह बगड़ी और कैलाश मेघवाल सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया।

  • पार्टी ने टिकट चयन के साथ-साथ बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और डबल इंजन सरकार की योजनाओं को घर-घर पहुंचाने का रोडमैप तैयार किया।

बीजेपी का ‘हस्ताक्षरित सिंबल’ मॉडल

सूत्रों के मुताबिक, जिन संभागों में रायशुमारी पूरी हो चुकी है, वहां के निकाय प्रभारियों को प्रदेश अध्यक्ष के हस्ताक्षर वाले खाली सिंबल फॉर्म सौंपे गए हैं। प्रदेश कार्यालय में नाम फाइनल होने के बाद संबंधित जिला अध्यक्ष और विधायक को मेल के जरिए इसकी जानकारी दी जाएगी। इसके बाद जिला कार्यालय में अधिकृत प्रत्याशी को चुपचाप बुलाकर पार्टी का सिंबल सौंप दिया जाएगा, जिससे विरोधियों को बगावत करने या निर्दलीय नामांकन की तैयारी का मौका न मिल सके।

कांग्रेस का भी विवादित सीटों पर यही प्लान

कांग्रेस पार्टी भी इसी राह पर आगे बढ़ रही है। कई जिलों में पार्टी ने जिलाध्यक्षों को सिंबल भेजने शुरू कर दिए हैं। जिन वार्डों में दावेदारों के बीच भारी खींचतान या विवाद है, वहां कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची सार्वजनिक करने से बचेगी।

  • जिलाध्यक्षों को स्थानीय समीकरणों के आधार पर निर्णय लेने की छूट दी गई है।

  • जिन सीटों पर आम सहमति है, वहां नाम घोषित किए जा सकते हैं, लेकिन विवादित वार्डों में सीधे उम्मीदवार या संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर तक सिंबल पहुंचाया जाएगा।

बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारी रोकने की कोशिश

निकाय चुनावों में वार्ड स्तर पर व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय गुटबाजी सबसे बड़ी चुनौती होती है। एक ही वार्ड से कई मजबूत दावेदार होने पर टिकट न मिलने वाले नेताओं के निर्दलीय मैदान में उतरने का जोखिम रहता है। प्रत्याशियों की सूची सार्वजनिक न करने से अंतिम समय तक पूरी प्रक्रिया गोपनीय रहेगी, जिससे डैमेज कंट्रोल आसान होगा और बगावत को काफी हद तक सीमित किया जा सकेगा।