माया-मोह में उलझे आधुनिक संत और ‘धार्मिक मनोरंजन’ बनता सत्संग

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शेखर दीक्षित
शेखर दीक्षित

भारतीय सनातन परंपरा में संत और संन्यास का सीधा अर्थ सांसारिक मोह-माया का त्याग रहा है। एक व्यक्ति सभी भौतिक सुखों, संपत्तियों और रिश्तों का मोह छोड़कर ही संतत्व की ओर कदम बढ़ाता है। लेकिन आज के परिदृश्य में यह परिभाषा धुंधली होती जा रही है। आज यह एक बड़ा और गंभीर सवाल है कि अगर ईश्वर की रची इस सांसारिक माया और संपदा में ही आसक्त रहना है, तो फिर उस भगवा चोले और वैराग्य के आडंबर की आवश्यकता ही क्या है? संपत्ति अर्जित करने की होड़ में शामिल कथाकथित संतों का यह आचरण सनातन धर्म की जड़ों को सींचने के बजाय उसे भीतर से खोखला कर रहा है।

अध्यात्म से भटका ‘इवेंट मैनेजमेंट’

एक समय था जब सत्संग का उद्देश्य समाज का आध्यात्मिक मार्गदर्शन और आत्मा का परिष्कार होता था। आज यह विडंबना ही है कि सत्संग अब धर्म से ज्यादा ‘धार्मिक मनोरंजन’ का एक बड़ा व्यापार बन चुका है। बड़े-बड़े वातानुकूलित पंडाल, हाई-टेक मंच और सोशल मीडिया की चमचमाती रील्स के बीच असल ज्ञान कहीं गुम हो गया है। आज के कई आधुनिक बाबाओं और महंतों ने धर्म को एक इवेंट मैनेजमेंट में तब्दील कर दिया है, जहां प्रसिद्धि और धन कमाना ही अंतिम लक्ष्य प्रतीत होता है। संत के नाम पर या उनका चोला पहनकर किया जा रहा यह व्यावसायिक आडंबर आम जनमानस की आस्था को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

संस्कारों की पहली पाठशाला घर है, सोशल मीडिया नहीं

अगर हमें वास्तव में अपनी हिंदू संस्कृति और पूर्वजों के संस्कारों को बचाना है, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं और आस्था के केंद्रों को फिर से तय करना होगा। ज्ञान और संस्कार की पहली सीढ़ी हमारा घर है। आज की पीढ़ी और समाज को यह समझना होगा कि सबसे पहले अपने माता-पिता की बातों को सुनें और उनका अनुसरण करें। जीवन में गुरु का स्थान इसके बाद आता है। रही बात सोशल मीडिया पर तैरने वाले 30 सेकंड के प्रवचनों और रील्स वाले बाबाओं की, तो उन्हें इस क्रम में सबसे अंत में ही रखा जाना चाहिए। आभासी दुनिया का ज्ञान कभी भी पारिवारिक संस्कारों की जगह नहीं ले सकता।

कड़वा है, मगर सत्य है

यह बात कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदारों या अंधभक्तों को बुरी लग सकती है, लेकिन यह आज के समाज का सबसे कड़वा सत्य है। धर्म का संरक्षण बड़े आयोजनों और प्रदर्शन से नहीं, बल्कि आचरण की शुद्धता से होता है। जब तक समाज ‘मनोरंजन’ और ‘अध्यात्म’ के बीच का अंतर नहीं समझेगा, तब तक वैराग्य के नाम पर आस्था का यह व्यापार यूं ही फलता-फूलता रहेगा। सनातन धर्म की असली ताकत उसके त्याग में है, धन-संपत्ति के संचय में नहीं।