NCP ने आरक्षण पर उठाया सवाल, सवर्ण सांसदों की चुप्पी पर घेरा

एनसीपी

लखनऊ : राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सलिल कुमार सिंह ने आरक्षण पर अपनी बात रखते हुए कहा कि   इसे राजनीतिक रूप से धारदार लेकिन तथ्यात्मक रखने के लिए “नगण्य” को “बेहद कमजोर” कहना बेहतर रहेगा। मुद्दा किसी जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और आवाज़ उठाने की कमी पर केंद्रित हो सकता है।

आरक्षण विरोध में सवर्ण सांसदों और नेताओं की भूमिका इतनी कमजोर क्यों है?

आज आरक्षण व्यवस्था पर देश में व्यापक बहस हो रही है। Gen Z अपने भविष्य, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों और पदोन्नति को लेकर सवाल पूछ रही है। लेकिन इस बहस में उन सवर्ण सांसदों और नेताओं की आवाज़ बेहद कमजोर दिखाई देती है, जो अपने समर्थक वर्ग की चिंताओं को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रख सकते हैं।

सवाल यह नहीं कि कोई नेता आरक्षण का समर्थन करता है या विरोध—सवाल यह है कि क्या वह इस विषय पर खुलकर, तथ्यों के साथ और बिना राजनीतिक भय के अपनी बात रखता है?

आरक्षण के ऐतिहासिक कारणों और सामाजिक न्याय की आवश्यकता का सम्मान करते हुए भी आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था, उसकी सीमा, प्रभाव और भविष्य पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है। Gen Z को अब चुप्पी नहीं, स्पष्टता चाहिए।

अगर आरक्षण पर बहस हो रही है, तो सवर्ण समाज के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी—क्योंकि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं, बल्कि अपने मतदाताओं की जायज़ चिंताओं को सदन और समाज के सामने रखने की जिम्मेदारी भी है।

मुद्दा किसी जाति के खिलाफ नहीं—मुद्दा समान अवसर, निष्पक्ष व्यवस्था और लोकतांत्रिक आवाज़ का है।