ईरान का अमेरिका पर तीखा हमला ‘इकोनॉमिक आतंकवाद’ का लगाया आरोप

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में संघर्ष और खाद्य सुरक्षा पर आयोजित एक सत्र के दौरान ईरान ने अमेरिका पर जोरदार हमला बोला है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के उप राजदूत गुलामहुसैन दरजी ने अमेरिकी प्रतिबंधों को खारिज करने की अपील की है। उन्होंने वाशिंगटन पर अन्य देशों को अपनी संप्रभुता और वैध नीतियों को अमेरिकी मांगों के आगे झुकाने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया।
ईरानी दूत का यह बयान अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ (Operation Economic Outcast) के तहत नए प्रतिबंधों की घोषणा के ठीक एक दिन बाद आया है।
आर्थिक नाकेबंदी और ‘इकोनॉमिक आतंकवाद’ का आरोप
दरजी ने अमेरिकी कदमों को ‘आर्थिक आतंकवाद’ का नया अभियान करार दिया। उनके मुताबिक, 24 अगस्त को घोषित किए गए नए अमेरिकी प्रतिबंध और ईरानी वाणिज्यिक जहाजों के खिलाफ कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य देश की आर्थिक नाकेबंदी करना है।
उन्होंने व्यापार, भोजन और ऊर्जा को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए अमेरिका की निंदा की। सुरक्षा परिषद में उन्होंने अन्य सदस्य देशों से अपील की कि वे अमेरिका द्वारा थोपे गए इन एकतरफा प्रतिबंधों का कड़ा विरोध करें। दूत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा या नेविगेशन की स्वतंत्रता के बहाने ऐसी कार्रवाइयों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री विवाद
आर्थिक प्रतिबंधों को समुद्री टकराव से जोड़ते हुए ईरानी प्रतिनिधि ने अमेरिका पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी वाणिज्यिक जहाजों पर अमेरिकी नाकेबंदी और हमले ईरान की संप्रभुता तथा समुद्र के अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन हैं।
अपने बयान में उन्होंने 12 अगस्त को जारी अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अमेरिकी बलों ने 59 वाणिज्यिक जहाजों का मार्ग बदला, तीन को निष्क्रिय किया और दो पर बोर्डिंग की। दरजी के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापार और नेविगेशन में होने वाली अस्थिरता का मूल कारण अमेरिका और इजरायल का आक्रामक युद्ध है।
युद्ध, खामेनेई की हत्या और नागरिकों की मौत का दावा
ईरान ने 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए कथित युद्ध को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए विनाशकारी बताया है। दरजी ने सुरक्षा परिषद में दावा किया कि इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों और 3,400 से अधिक नागरिकों की जान गई, जिनमें सैकड़ों महिलाएं और बच्चे शामिल थे।
ईरानी दूत ने 17 जून के ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस समझौते में अमेरिका को ईरान के खिलाफ बल प्रयोग से बचने को कहा गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि वाशिंगटन ने 27 जून को एक और सैन्य अभियान शुरू कर इस समझौते का उल्लंघन किया। ईरान का दावा है कि इस हमले में 60 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई, 630 घायल हुए और हवाई अड्डों व पुलों सहित प्रमुख बुनियादी ढांचों को जानबूझकर निशाना बनाया गया।
आत्मरक्षा का अधिकार और सहयोगी देशों को चेतावनी
हमलों में रसद, खुफिया जानकारी या हवाई क्षेत्र मुहैया कराने वाले देशों को भी ईरान ने चेतावनी दी है। दरजी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ऐसे देश भी जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपने क्षेत्र और संप्रभुता के खिलाफ हुए आक्रामक कदमों के जवाब में जवाबदेही तय करने और आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करेगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि इससे जुड़ी किसी भी व्यवस्था को केवल इसके तटीय राज्य, यानी ईरान और ओमान ही नियंत्रित कर सकते हैं। उन्होंने सुरक्षा परिषद को चेतावनी दी कि यदि अमेरिका के इन अवैध कदमों को चुनौती नहीं दी गई, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी।
गाजा में इजरायली कार्रवाई की निंदा
खाद्य सुरक्षा पर अपनी बात रखते हुए ईरानी दूत ने गाजा में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन को लेकर इजरायल की भी निंदा की। दरजी ने इजरायल पर नागरिकों और बुनियादी ढांचों को निशाना बनाने, भुखमरी थोपने और मानवीय सहायता में व्यवस्थित रूप से बाधा डालने का आरोप लगाया। उन्होंने सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2417 का हवाला दिया, जो युद्ध के तरीके के रूप में नागरिकों को भूखा रखने की निंदा करता है। दूत ने आरोप लगाया कि अमेरिका के राजनीतिक संरक्षण और बाधाओं के कारण परिषद जवाबदेही तय करने में बार-बार विफल रही है।
