वैवाहिक बलात्कार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली, जानें क्या है पूरा विवाद

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई की कोई नई तारीख तय करने से इनकार कर दिया है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में आगे बढ़ने से पहले केंद्र सरकार का पक्ष आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड पर आना जरूरी है। करीब 12 साल पहले एक शादीशुदा महिला की याचिका से शुरू हुई यह कानूनी और सामाजिक बहस अब देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले पर टिकी है।

महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पति उसकी इच्छा के खिलाफ बार-बार शारीरिक संबंध बनाता है। जब वह न्याय के लिए अदालत पहुंची, तो भारतीय कानून का एक पुराना प्रावधान उसके सामने दीवार बन गया। कानून के मुताबिक, अगर पति अपनी ही पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाता है, तो उसे बलात्कार (Rape) नहीं माना जाएगा।

कानून का वह ‘अपवाद’ जिस पर टिकी है पूरी बहस

भारत में अगर कोई पुरुष किसी महिला की इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाता है, तो वह सीधे तौर पर बलात्कार का अपराध है। भारतीय दंड संहिता में लंबे समय से एक अपवाद (Exception) मौजूद रहा है, जो पतियों को इस मामले में कानूनी सुरक्षा देता है। इसी “Marital Rape Exception” को खत्म करने की मांग हो रही है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह बुनियादी सवाल उठाया है कि अगर ‘सहमति’ ही रेप और सेक्स के बीच का फर्क तय करती है, तो शादी के बाद उस सहमति की अहमियत कैसे खत्म हो सकती है।

दिल्ली हाईकोर्ट के जजों की राय भी थी जुदा

यह मसला कानूनी होने के साथ-साथ सामाजिक विचारों के टकराव का भी है। इसका अंदाजा मार्च 2022 में आए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से लगाया जा सकता है। हाईकोर्ट की बेंच इस मुद्दे पर एक राय नहीं बना सकी और विभाजित फैसला दिया। एक जज ने वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को असंवैधानिक करार दिया, जबकि दूसरे जज ने इससे असहमति जताई। हाईकोर्ट में मतभेद के बाद ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अपराध बनाने के पक्ष और विरोध में तर्क

Marital Rape को अपराध बनाने की मांग कर रहे पक्ष का तर्क है कि शादी होने से किसी भी महिला की शारीरिक स्वायत्तता खत्म नहीं हो जाती। संविधान सभी महिलाओं को समान सुरक्षा का अधिकार देता है। पत्नी को कानून में कम सुरक्षा देना समानता के अधिकार का हनन है, क्योंकि सहमति हर रिश्ते में अनिवार्य है।

इसके उलट, इस बदलाव का विरोध करने वाले पक्ष की अपनी अलग चिंताएं हैं। उनका तर्क है कि इसे अपराध बनाने से विवाह संस्था पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे झूठे मुकदमों की बाढ़ आने की आशंका है और पति-पत्नी के बीच के साधारण निजी विवाद भी गंभीर आपराधिक मुकदमों में तब्दील हो सकते हैं।

आंकड़ों में छिपी है घर के भीतर की हिंसा

भारत में वैवाहिक बलात्कार का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, इसलिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पास इसका कोई सीधा डेटा नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) की रिपोर्ट एक अलग तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 18 से 49 वर्ष की आयु की करीब 29 फीसदी विवाहित महिलाओं ने जीवन में कभी न कभी पति द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलने की बात स्वीकार की है।

रिपोर्ट बताती है कि यौन हिंसा की शिकायत करने वाली महिलाओं के मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि उनका अपना पति था। महिला अधिकार समूह लगातार इसी डेटा का हवाला देते हैं।

NCRB की सालाना रिपोर्ट में भी ‘पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ (IPC 498A) के तहत दर्ज मामलों की संख्या हर साल एक लाख से अधिक रहती है। यह आंकड़ा बताता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक बहुत बड़ा हिस्सा घर की चारदीवारी के भीतर होता है।

इस पूरी बहस के केंद्र में अब यही सवाल है कि क्या विवाह किसी महिला की सहमति को स्थायी रूप से मान लेने का आधार बन सकता है। भारतीय समाज की पुरानी सोच और नई पीढ़ी के ‘सहमति’ से जुड़े सवालों के बीच कानूनी व्याख्या का रास्ता अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा।