बांग्लादेश से वास्तविक सच सीखने की जरुरत
अनुराग शुक्ला
अंग्रेज कवि अल्फ्रेड लॉर्ड टेनिसन ने एक कविता “द ग्रैंडमदर” नाम की कविता लिखी थी। यह कविता साल 1864 में उनके कविता संग्रह ‘इनोक आर्डन, एंड अदर पोएम्स’ में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने इसमें लिखा था कि आधा झूठ सच से ज्यादा खतरनाक होता है। वैसे तो उनकी कविता का शब्दशः अर्थ है वह झूठ जो आधा सच होता है, वह सभी झूठों में सबसे काला (खतरनाक) होता है, लेकिन जिस झूठ में थोड़ा सच मिला हो, उससे लड़ना (उसे गलत साबित करना) कहीं ज्यादा मुश्किल काम है।
आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा जो इस समय जंतर मंतर प्रदर्शन की पोस्टर गर्ल है वो ऐसे ही खतरनाक आंशिक सच बोल रही हैं। उन्होंने 14 अक्टूबर को बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भेजे वीडियो संदेश में कहा था कि बांग्लादेश के छात्र आंदोलन ने भारत के जेन जी युवाओं को “क्रांति का रास्ता” दिखाया है। ये भी कहा कि भारत में चल रहे जेन जी आंदोलन की शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई और वहां के युवाओं ने रास्ता दिखाया। उन्होंने ये भी कहा कि बांग्लादेश का आंदोलन लोकतंत्र और मतदाताओं के अधिकारों के लिए था; भारत में भी युवा इन्हीं अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने भारत और बांग्लादेश के युवाओं के संघर्ष को धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई भी बताया।
नेहा बोरा सच भी बोल रही हैं पर उसमें दो तिहाई झूठ का तडका है। बांग्लादेश के जेन जी आंदोलन शुरुआत में सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली के सुधार की मांग से शुरू हुई थी, लेकिन दमन और हिंसा के बाद उसके उद्देश्य बढ़कर न्याय, जवाबदेही और सरकार परिवर्तन तक पहुंच गया।
बांग्लादेश के छात्र आंदोलन की असली शुरुआत
बांग्लादेश में आंदोलन कर रहे छात्रों ने मांग की थी कि सरकारी नौकरियों में अधिकतम सीटें योग्यता के आधार पर भरी जाएं। उनकी आपत्ति विशेष रूप से स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए 30% कोटा था। इसका सीधा लोकतंत्र से कोई मतलब नहीं था। इसका मतदाता अधिकार से नहीं बल्कि वहां फैले आरक्षण से था।
आंदोलन के बाद धार्मिक कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश के युवाओँ ने धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई का बीड़ा उठाया पर इस आंदोलन का फायदा नेताओं ने उठाया। कट्टरपंथियो ने सीधे तौर पर उठाया। हसीना सरकार के पतन के बाद राजनीतिक रिक्तता, कमजोर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा-रिक्ति ने कट्टरपंथी समूहों को संगठित होने का अवसर दिया। इस्लामी राजनीतिक शक्तियों की सार्वजनिक उपस्थिति बढ़ी; अंतरिम सरकार ने जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसे संगठनों ने महिला-अधिकार सुधार आयोग की सिफारिशों के विरोध में बड़े प्रदर्शन किए, जिससे महिला अधिकारों और बहुलतावाद पर दबाव बढ़ा। धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं, पर हिंसा, मंदिरों पर हमले, भूमि विवाद और धमकियों की घटनाएं बढ़ीं।
हिन्दू महिलाओं के साथ दरिंदगी की गई. हिन्दुओं के साथ हिंसा की गई. उनकी संपत्तियों पर कब्जा कर लिया गया. सरेआम उनकी हत्याएं की गईं. बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं पर चिंता जताते हुए एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने कहा मई 2026 में कहा था कि जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच देश के 62 जिलों और सभी 8 प्रशासनिक मंडलों में हिंसा की 505 घटनाएं दर्ज की गईं. इन घटनाओं में हत्या, अपहरण, शारीरिक हमले, यौन हिंसा, धार्मिक स्थलों पर हमले और जमीन पर कब्जे जैसे मामले शामिल हैं. ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (एचआरसीबीएम) ने अपनी ताजा रिपोर्ट ‘द परसीक्यूशन कंटिन्यूज: माइनॉरिटी कम्युनिटीज अंडर सस्टेन्ड अटैक इन बांग्लादेश’ में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी.
भारत में जंतर मंतर आंदोलन की नींव कितनी मजबूत है?
ये तो हुआ पूरा सच पर जंतर मंतर में चल रहे आंदोलन जिसे लोकतंत्र की रक्षा बताया जा रहा है उसकी नींव भी मजबूत नहीं है। जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन की शुरुआत विपक्ष के आरोप से हुई। विपक्ष ने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर करीब 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं। विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट से इन सभी आधिकारिक “फाइलों, एजेंडा, मिनट्स और आपत्तियों” को सार्वजनिक करने की मांग की है ताकि यह साबित हो सके कि फैसले एकतरफा लिए गए। वैसे आपत्तियां होना किस सिस्टम में नई बात है पहले भी चुनाव आयोग में आयुक्तों के बीच आपत्ति हुई है।
एसआईआर, चुनाव आयोग और विपक्ष के आरोप
इसके अलावा आंदोलन के पीछे एसआईआर का मुद्दा भी रहा। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक के अलंद निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए दावा किया कि कांग्रेस बहुल बूथों से करीब 6,000 नाम हटाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि ये नाम राज्य के बाहर के मोबाइल नंबरों और तकनीकी सॉफ्टवेयर (ऑटोमेशन) का उपयोग करके सुबह-सुबह डिलीट किए गए। इसके साथ ही उन्होंने कर्नाटक सीआईडी द्वारा चुनाव आयोग को लिखे गए पत्रों का भी उल्लेख किया।
वहीं चुनाव आयोग ने साफ किया कि कोई भी नागरिक ऑनलाइन सीधे किसी का नाम नहीं हटा सकता। हर नाम को हटाने से पहले बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ द्वारा भौतिक सत्यापन और पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को “गलत और निराधार” बताते हुए कहा है कि यदि उनके पास कोई पुख्ता सबूत हैं, तो वे नियमों के तहत एक लिखित शपथ पत्र जमा करें। आयोग का कहना है कि सिर्फ सार्वजनिक मंचों पर आरोप लगाने से वे सच साबित नहीं हो जाते। पर राहुल गांधी ने शपथ पत्र पर चुप्पी साध ली है।
आंदोलन की कीमत कौन चुका रहा है?
एक आशंका, एक आरोप और आंदोलन। ये आंदोलन किसके लिए हैं। सामान्य नागरिक तो नहीं दिखते हैं। पार्टियों से जुड़े कार्यकर्ता, छात्र संगठनों के लोग। सामान्य लोग तो इस आंदोलन की कीमत चुका रहे हैं। जंतर मंतर पर प्रदर्शनों का सीधा आर्थिक नुकसान मुख्य रूप से आसपास के छोटे दुकानदारों, खानपान संस्थाओं और व्यापारियों को हुआ है। जंतर मंतर के पास लंबे समय से दुकान चला रहे एक विक्रेता ने मीडिया को बताया कि उन्हें एक महीने में लगभग 40% तक नुकसान हुआ। कुछ व्यापारियों के अनुसार करीब 15 दिन तक कारोबार ठप रहा। प्रदर्शन के दौरान भीड़, यातायात रुकावट और सुरक्षा की चिंता से ग्राहकों की आवाजाही घटी, जिससे रोज़ाना बिक्री और आय प्रभावित हुई। खान मार्केट से जनपथ तक के व्यापार प्रभावित हुए। रोजाना 300 करोड़ का नुकसान का अनुमान है। त्योहारों के सीजन को लेकर ये आशंका बढ़ रही है।
बांग्लादेश में आंदोलन का मानवीय और आर्थिक नुकसान
भारत हो या बांग्लादेश आंदोलन की कीमत तो सामान्य नागरिक चुकाते हं। बांग्लादेश की 2024 की छात्र-नेतृत्व वाली क्रांति (जुलाई विद्रोह) ने मानवीय, आर्थिक और संस्थागत स्तर पर गहरा नुकसान किया। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान में 15 जुलाई से 5 अगस्त 2024 के बीच लगभग 1,400 लोग मारे गए; इनमें से अधिकांश सुरक्षाबलों की गोलीबारी से मारे गए बताए गए। मृतकों में 12–13% बच्चे होने का अनुमान था; रिपोर्ट में मनमानी गिरफ्तारी, हिरासत, यातना और लिंग-आधारित हिंसा की भी बात कही गई।
आर्थिक नुकसान भी कम नहीं है। फिक्की ने कुल नुकसान बांग्लादेश में 1000 करोड़ अमरीकी डालर से अधिक आंका था। आंदोलन के दौरान इंटरनेट, संचार और परिवहन में व्यवधान से आपूर्ति श्रृंखला टूटी, जिससे व्यापार, निर्यात और रोज़गार प्रभावित हुए। रेडीमेड कपड़ा क्षेत्र—जो बांग्लादेश के निर्यात में लगभग 80% से अधिक का हिस्सा है—सबसे अधिक प्रभावित हुआ।
सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश को क्या मिला?
बांग्लादेश की 2024 की छात्र-आंदोलन से सबसे बड़ा तात्कालिक फायदा कोटा प्रणाली का सुधार, लंबे समय से सत्तारूढ़ सरकार का पतन हुआ है। स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए कोटा 30% से घटाकर 5% कर दिया गया; शेष 2% विकलांग, तृतीय लिंग और आदिवासी समुदायों के लिए रखा गया। यानी जनता की स्मृति से उस पन्ने को ही फाड़ दिया गया जिसने बांग्लादेश की नींव रखी थी। जातिर पिता और बंग बंधु शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति गिराई और उनके प्रति सम्मान पर कुठाराघात किया गया।
इस आंदोलन में मारे गए छात्रों/नागरिकों को न्याय और दोषियों पर कार्रवाई आंशिक दिखती है। जांच और अभियोजन की प्रक्रिया शुरू हुई, पर पूरा न्याय अभी लंबित है। पीड़ित परिवारों को मुआवजा भी आंशिक रूप से हुई है। सबसे बड़ी मांग भ्रष्टाचार की जड़ें खत्म नहीं हुईं हैं। आंदोलन का केंद्रीय आरोप—राजनीतिक भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म और अभिजात वर्ग की पकड़—संरचनात्मक समस्या है, जिसे केवल सरकार बदलने से हल नहीं होता। ये बना हुआ है। यानी जनता जिसने सबकुछ झेला उसे कुछ नहीं मिला।
लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन का सवाल
सत्ता बदली लोकतंत्र की दुहाई देकर हुए आंदोलन में देश की सबसे बड़ी शेख हसीना की पार्टी को बैन कर दिया गया। यानी छात्रों के कंधे पर चढकर सत्ता परिवर्तन हुआ। शायद नेहा बोरा, प्रशांत भूषण, प्रकाश राज और राहुल गांधी की कांग्रेस भारत में भी सिर्फ यही चाहती है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

