‘तेरा काल आ गया है कंस…’ मथुरा की हाई-सिक्योरिटी जेल से नंदगांव तक

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी कृष्ण जन्माष्टमी का दिन। इस साल 4 सितंबर को देशभर में यह पर्व पूरी आस्था के साथ मनाया जा रहा है। भक्त व्रत रख रहे हैं, मंदिरों में झांकियां सज रही हैं और कृष्ण लीलाओं का मंचन हो रहा है। लेकिन इस पूरे उत्सव के केंद्र में है एक ऐसी कथा, जिसमें सत्ता का लालच, जेल की सलाखें, रातों-रात हुआ एक ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’ और एक तानाशाह का खौफ शामिल है। द्वापर युग में मथुरा के एक कारागार से शुरू हुई यह कहानी आज भी हर घर में उतनी ही श्रद्धा के साथ सुनी जाती है।
सत्ता का नशा और कंस का ‘जेल मॉडल’
द्वापर युग में मथुरा की गद्दी पर भोजवंशी राजा उग्रसेन का राज था। लेकिन उनके महत्वाकांक्षी पुत्र कंस को सत्ता की ऐसी भूख जगी कि उसने अपने ही पिता को गद्दी से उतारकर जेल में डाल दिया और खुद को मथुरा का स्वयंभू राजा घोषित कर दिया। आज के दौर में जहां नेता कुर्सी बचाने के लिए सिर्फ दल या गठबंधन बदलते हैं, कंस ने सीधे अपने पिता को ही ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेजने के बजाय सलाखों के पीछे भेज दिया था। सत्ता के इस नशे में सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक कि वह अपनी ही बहन देवकी को उसकी शादी के बाद विदा करने नहीं निकला।
आकाशवाणी जिसने उड़ा दी तानाशाह की नींद
कंस जब बहन देवकी को ससुराल ले जा रहा था, तभी अचानक एक आकाशवाणी हुई। आवाज गूंजी, “हे कंस, जिस देवकी को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी में तेरा काल बसा है। इसके गर्भ से पैदा होने वाला आठवां बालक ही तेरा वध करेगा।”
इस एक ‘ब्रेकिंग न्यूज’ ने सत्ता के नशे में चूर कंस के पसीने छुड़ा दिए। मौत के खौफ से उसने देवकी और वासुदेव को उसी कारागार में बंदी बना लिया। डर इतना हावी था कि उसने एक-एक कर देवकी की शुरुआती सात संतानों को पैदा होते ही मौत के घाट उतार दिया।
आधी रात का ‘सीक्रेट मिशन’ और नंदगांव की यात्रा
आखिरकार वह रात आ गई जब आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा के कारागार में जन्म लिया। कथाओं के अनुसार, उसी समय नंदगांव में नंद और यशोदा के घर एक बेटी का जन्म हुआ था। श्रीकृष्ण के जन्मते ही कारागार में चमत्कारिक रोशनी हुई और वासुदेव जी को आदेश मिला कि वे नवजात पुत्र को वृंदावन में नंद जी के घर छोड़ आएं और वहां जन्मी कन्या को मथुरा ले आएं।
इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी आधुनिक ‘जेल ब्रेक’ या ‘सिक्योरिटी फेल्योर’ से बड़ा था। कंस की जेल के सारे भारी-भरकम ताले खुद-ब-खुद खुल गए और पहरेदार ऐसी गहरी नींद में चले गए जैसे उन्होंने किसी चुनावी वादे की गोली खा ली हो। वासुदेव जी श्रीकृष्ण को एक सूप में रखकर सुरक्षित नंदगांव पहुंचा आए और वहां से कन्या को लेकर वापस जेल लौट आए।
योगमाया की चेतावनी और कंस की हार
सुबह होते ही जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के बारे में पता लगा, तो वह फौरन कारागार पहुंचा। उसने बिना कुछ सोचे-समझे नवजात कन्या का वध करना चाहा। लेकिन कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई। वह कन्या कोई और नहीं, बल्कि स्वयं योगमाया का अवतार थी।
जाते-जाते उन्होंने कंस को खुली चुनौती दी, “मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला वृंदावन जा पहुंचा है।” इस तरह एक तानाशाह की तमाम सुरक्षा एजेंसियों और पहरेदारों को चकमा देकर, श्रीकृष्ण सुरक्षित नंदगांव पहुंच गए थे, जहां से कंस के अंत और धर्म की स्थापना की असली कहानी शुरू होनी थी।
