काला पानी रिव्यू: Dev Anand और Madhubala की फिल्म आज प्रासंगिक

1958 की ‘काला पानी’ की शुरुआत एक पारिवारिक सच से होती है, लेकिन जल्दी ही कहानी एक पुराने हत्या के मामले की जांच में बदल जाती है। करण मेहरा को बचपन से बताया गया है कि उसके पिता की मौत हो चुकी है। जब उसे पता चलता है कि पिता जीवित हैं और 15 साल पुराने हत्याकांड में जेल की सजा काट रहे हैं, तो उसकी दुनिया बदल जाती है।
करण को यकीन है कि उसके पिता ने हत्या नहीं की। वह मामले की दोबारा जांच और नए सबूतों के जरिए उन्हें जेल से बाहर निकालने की कोशिश शुरू करता है। इस तलाश में उसे पत्रकार आशा और हत्या की चश्मदीद गवाह किशोरी का साथ मिलता है। कहानी आगे बढ़ती है तो पता चलता है कि जिस मामले में करण सच तलाश रहा है, उसकी परतों में पुलिस, गवाह और सरकारी वकील तक जुड़े हुए हैं।
राज खोसला के निर्देशन में बनी यह फिल्म crime thriller के ढांचे में परिवार, प्रेम, जांच और न्याय की कहानी को साथ लेकर चलती है। Dev Anand, Madhubala और Nalini Jaywant इसके केंद्र में हैं।
कहानी की शुरुआत ही एक छिपे हुए सच से
करण के लिए सबसे बड़ा झटका यह जानना है कि उसके पिता शंकरलाल जिंदा हैं। मां ने बचपन से उससे पिता की मौत की बात कही थी। जेल में मुलाकात के बाद करण को पता चलता है कि शंकरलाल उस हत्या के मामले में बंद हैं जिसे उन्होंने किया ही नहीं।
यहीं से करण का लक्ष्य तय हो जाता है। उसे सिर्फ पिता से मिलना नहीं है, बल्कि वह यह पता लगाना चाहता है कि 15 साल पहले हुआ क्या था और उसके पिता को अपराधी कैसे बना दिया गया।
मामले को फिर से खुलवाने के लिए उसे नए सबूत चाहिए। जांच के दौरान एक चिट्ठी का पता चलता है, जो शंकरलाल की बेगुनाही साबित करने में अहम हो सकती है।
चिट्ठी के पीछे करण, और साजिश के पीछे कौन?
इंस्पेक्टर मेहता करण को किशोरी और जुम्मन सहित कुछ गवाहों के बारे में बताते हैं। मेहता को खुद मामले में कुछ गड़बड़ी का शक था, लेकिन उनके मुताबिक तत्कालीन अभियोजक जसवंत राय ने उन्हें चुप करा दिया था।
यहीं फिल्म का conflict बड़ा हो जाता है। करण जिस व्यक्ति से अपने पिता को बचाने के लिए कानूनी रास्ता पूछता है, वही आगे चलकर साजिश का हिस्सा निकलता है।
करण किशोरी तक पहुंचता है क्योंकि उसके पास वह चिट्ठी है जो पूरे मामले की दिशा बदल सकती है। किशोरी को लगता है कि करण ने उसके साथ धोखा किया है। लेकिन जब उसे करण के पिता की कहानी का पता चलता है, तो वह अपना फैसला बदलती है और चिट्ठी उसे सौंप देती है।
सबूत हाथ आया, लेकिन कोर्ट तक पहुंचने से पहले जल गया
करण बेहद उत्साहित होकर चिट्ठी अभियोजक जसवंत राय को दिखाता है। उसे उम्मीद है कि अब उसके पिता के मामले को दोबारा खोला जा सकेगा।
लेकिन जसवंत राय चिट्ठी जला देता है।
करण को इसी क्षण समझ आता है कि मामला सिर्फ पुराने हत्याकांड का नहीं है। जिस व्यक्ति से वह कानूनी मदद की उम्मीद कर रहा था, वह खुद साजिश में शामिल है।
करण इसके खिलाफ विरोध करता है और जसवंत राय के घर के बाहर प्रदर्शन शुरू करता है। पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है। दूसरी तरफ आशा अपने अखबार के जरिए अभियोजक के खिलाफ मामला सामने लाने की कोशिश करती है, लेकिन संपादक उसे रोक देता है। वजह साफ है, उसके पास प्रकाशित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
फिल्म का यह हिस्सा खास तौर पर प्रभावी है क्योंकि यहां करण के सामने दो रास्ते बंद होते दिखाई देते हैं। अदालत में सबूत चाहिए और अखबार के लिए भी सबूत चाहिए।
आशा और किशोरी कहानी को अलग दिशा देती हैं
Madhubala की आशा सिर्फ करण की प्रेमिका नहीं है। वह पत्रकार है और मामले से जुड़ी सच्चाई सामने लाने की कोशिश करती है। लेकिन उसकी अपनी पेशेवर सीमाएं हैं।
दूसरी तरफ Nalini Jaywant की किशोरी कहानी की अहम कड़ी है। वह उस हत्याकांड की चश्मदीद गवाह है और उसके पास ऐसा सबूत है जो पूरे मामले को बदल सकता है।
करण और किशोरी का रिश्ता भी कहानी के नैतिक तनाव को सामने लाता है। शुरुआत में करण उससे जानकारी हासिल करने के लिए भावनात्मक करीबियां बढ़ाता है। जब किशोरी को यह पता चलता है तो उसे लगता है कि उसके साथ छल हुआ है। बाद में करण के पिता की स्थिति समझने के बाद वही किशोरी उसके पक्ष में खड़ी होती है।
Dev Anand की फिल्म, लेकिन असली ताकत ensemble में
Dev Anand ने करण मेहरा के किरदार में फिल्म का भावनात्मक और investigative दोनों भार उठाया है। करण लगातार सवाल करता है, लोगों से मिलता है और पुराने मामले की कड़ियां जोड़ता है। उसका किरदार किसी सर्वशक्तिमान detective की तरह नहीं लिखा गया, बल्कि एक बेटे की बेचैनी से आगे बढ़ता है।
Madhubala आशा के रूप में फिल्म के romantic हिस्से को संभालती हैं, जबकि Nalini Jaywant को किशोरी के रूप में ज्यादा जटिल किरदार मिलता है। किशोरी के भीतर अपराध की दुनिया से जुड़ा अतीत भी है और सच सामने लाने का फैसला भी।
इसी अभिनय के लिए Dev Anand को Filmfare का Best Actor और Nalini Jaywant को Best Supporting Actress का पुरस्कार मिला था।
S D Burman का संगीत कहानी को सांस देता है
फिल्म का संगीत S D Burman ने दिया और गीत Majrooh Sultanpuri ने लिखे। ‘हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये’ और ‘अच्छा जी मैं हारी, चलो मान जाओ ना’ जैसे गीत फिल्म के गंभीर crime plot के बीच भावनात्मक जगह बनाते हैं।
‘अच्छा जी मैं हारी’ में Madhubala की मौजूदगी फिल्म के romantic पक्ष को खास बनाती है। दूसरी तरफ कहानी का तनाव लगातार हत्या, सबूत और साजिश के इर्द-गिर्द घूमता रहता है।
यही contrast ‘काला पानी’ के अनुभव को दिलचस्प बनाता है। फिल्म हर वक्त suspense पर नहीं टिकी रहती, लेकिन कहानी की मुख्य जांच को संगीत और romance कमजोर भी नहीं करते।
1958 की फिल्म, लेकिन कहानी का ढांचा आज भी मजबूत
‘काला पानी’ 9 मई 1958 को रिलीज हुई थी और व्यावसायिक रूप से सफल रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह उस साल की आठवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली Bollywood फिल्मों में शामिल थी।
फिल्म का आधार A. J. Cronin के उपन्यास Beyond This Place से जुड़ा है और यह 1955 की बंगाली फिल्म Sabar Uparey का remake थी। राज खोसला के निर्देशन में बनी इस फिल्म को crime thriller के रूप में रखा गया, लेकिन इसकी कहानी में परिवार और प्रेम भी बराबर मौजूद हैं।
सबसे मजबूत हिस्सा इसका अंतिम खुलासा है। किशोरी मूल चिट्ठी लेकर वापस आती है। करण उसे जमा करता है और इसके बाद जसवंत राय अपना अपराध स्वीकार कर लेता है। शंकरलाल जेल से रिहा होते हैं और कहानी करण और आशा की शादी के साथ खत्म होती है।
‘काला पानी’ की खासियत यह नहीं कि इसमें एक बेटा अपने पिता को बचाता है। असली ताकत उस रास्ते में है, जिसमें हर बार सच के सामने कोई न कोई दीवार खड़ी हो जाती है। चिट्ठी जल जाने के बाद भी कहानी रुकती नहीं, बल्कि उसी क्षण करण को पता चलता है कि उसे अपराधी से ज्यादा उस व्यवस्था से लड़ना है जिसने अपराध को छिपाया है।
Story: 9/10
Performances: 9/10
Music: 8.5/10
Final Verdict: एक मजबूत retro crime thriller, जिसे सिर्फ nostalgia के लिए नहीं, इसकी कहानी के लिए भी देखा जा सकता है।
