गुलमोहर ग्रीन्स केस में हाईकोर्ट सख्त, 25 लाख जुर्माना और FIR के आदेश

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शकील अहमद सैफी
शकील अहमद सैफी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के चर्चित गुलमोहर ग्रीन्स मामले में एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना है कि प्रमोटर (बिल्डर) ने डेवलपमेंट अथॉरिटी के साथ मिलकर गरीब अपार्टमेंट मालिकों को परेशान किया है और कॉमन एरिया बेचकर उनके साथ धोखाधड़ी की है, जो कि एक गंभीर अपराध है। कोर्ट ने इस मामले में बिल्डर पर 25 लाख रुपए का हर्जाना लगाया है, जिसे फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (GGRWA) के खाते में जमा करना होगा।

पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच के आदेश

कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि इस फैसले की तारीख से दो हफ्ते के भीतर प्रमोटर के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए। प्रमोटर पर धोखाधड़ी, तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने और ‘एक्ट, 2010’ के प्रावधानों का उल्लंघन करने का आरोप है। अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि इस मामले की जांच गाजियाबाद के एडिशनल कमिश्नर ऑफ पुलिस (Addl. CP) रैंक के स्तर या उससे ऊपर के अधिकारी द्वारा की जाएगी।

GDA अधिकारियों की मिलीभगत पर भी नाराजगी

अदालत ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) के अधिकारियों को भी आड़े हाथों लिया और माना कि वे प्रमोटर के साथ मिले हुए थे। अधिकारियों के लापरवाह रवैये के कारण ही याचिकाकर्ताओं और सोसाइटी के निवासियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी और लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। इसे देखते हुए कोर्ट ने GDA को निर्देश दिया है कि वह प्रत्येक याचिकाकर्ता को इस फैसले के सुनाए जाने की तारीख से दो महीने के अंदर 50,000 रुपए की लागत का भुगतान करे।

क्या है पूरा मामला और कैसे हुआ फर्जीवाड़ा?

यह पूरा विवाद साल 2005-2006 का है, जब साहिबाबाद के मोहन नगर स्थित 95 कटोरी मिल, ग्राम करहेड़ा की जमीन पर 34 टावर और 904 फ्लैट बनाने के लिए 29 मई 2006 को GDA से मूल नक्शा पास कराया गया था।

  • वायुसेना की जमीन का विवाद: निर्माण शुरू होने पर हिंडन एयरफोर्स स्टेशन के अधिकारियों ने आपत्ति जताई। जांच में पता चला कि जिस जमीन पर नक्शा पास हुआ था, उसमें आठ खसरा नंबर (4560 वर्ग मीटर जमीन) वायुसेना के हैं, जिसका अधिग्रहण भारत सरकार ने साल 1962 में ही कर लिया था। इसके बावजूद बिल्डर ने मालिकाना हक की सही जानकारी छिपाकर 3 जुलाई 2010 को मूल नक्शा रद्द होने के बाद भी अवैध निर्माण जारी रखा।

  • शमन (Compounding) के जरिए अवैध खेल: मूल नक्शा रद्द होने के बाद बिल्डर ने GDA अधिकारियों की मिलीभगत से शमन का सहारा लिया। 15 नवंबर 2011 को पहला शमन कराकर फ्लैटों की संख्या बढ़ाकर 1094 कर दी गई। इसके बाद 13 जनवरी 2015 को दूसरा शमन और 18 दिसंबर 2024 को GDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष द्वारा तीसरे शमन के जरिए अवैध निर्माणों को लगातार मंजूरी दी जाती रही।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी और अवैध शमन रद्द

फ्लैट खरीदारों ने तीसरे शमन के तहत दी गई इस मनमानी मंजूरी को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शमन किसी भी अवैध निर्माण को नियमित करने का असीमित अधिकार नहीं हो सकता और एक ही तरह के अपराध को बार-बार शमन के जरिए नियमित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पाया कि बिल्डर ने वायुसेना की जमीन को अपने कुल प्लॉट के क्षेत्रफल में दिखाकर गलत तरीके से फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की गणना करवाई थी। रिकॉर्ड से साफ हुआ कि वायुसेना की जमीन को हटाने के बाद तीसरे शमन के लिए जरूरी FAR बचता ही नहीं था, जिससे तीसरा शमन पूरी तरह अवैध साबित हुआ।