बैलेट पेपर चुनाव के नतीजों ने बढ़ाई सियासी हलचल, राज्यों में बदले समीकरण

ईवीएम पर शोर मचाने वाले, बैलेट पेपर की मांग करने वाले और हर हार के बाद “मशीन ने हराया” का राग अलापने वाले विपक्षी दलों के लिए विधान परिषद के ताजा नतीजे एक करारा तमाचा हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 स्नातक व शिक्षक सीटों पर चुनाव हुआ। और सबसे महत्वपूर्ण बात—ये चुनाव पूरी तरह बैलेट पेपर से हुए। ईवीएम का नामोनिशान नहीं था। फिर भी नतीजे क्या आए?
एनडीए और भाजपा का दबदबा कायम रहा।
बैलेट आया, तो विपक्ष क्यों नहीं जीत गया?
विपक्ष सालों से एक ही बात दोहराता रहा है—ईवीएम में गड़बड़ी होती है, इसलिए बैलेट से चुनाव करो। जनता की असली पसंद तभी सामने आएगी।
अब बैलेट आ गया। पढ़े-लिखे मतदाताओं (स्नातक और शिक्षक) ने वोट डाले। तो क्या विपक्ष ने क्लीन स्वीप कर दिया? नहीं।
- कर्नाटक में कांग्रेस सरकार होते हुए भी बीजेपी-जेडीएस गठबंधन ने चारों सीटें अपने नाम कर लीं। बेंगलुरु शिक्षक सीट पर कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार को भी हार मिली।
- बिहार में एनडीए का पलड़ा भारी रहा। पटना स्नातक सहित कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज की।
- महाराष्ट्र में महायुति और महाविकास अघाड़ी के बीच टक्कर जरूर हुई, लेकिन सत्ता पक्ष कई जगह मजबूत दिखा।
- उत्तर प्रदेश में सपा ने कुछ सीटों पर अच्छी लड़ाई दी और लखनऊ स्नातक जैसी सीट पर बढ़त बनाई, लेकिन कुल मिलाकर बीजेपी 6 और सपा 5 के आसपास के आंकड़ों में मुकाबला रहा। भाजपा ने लखनऊ शिक्षक, मेरठ की दोनों सीटें समेत कई जगह जीत दर्ज की।
अगर ईवीएम ही असली खलनायक था, तो बैलेट पेपर में विपक्ष को तो तूफानी जीत मिलनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सपा का दावा और सच्चाई
समाजवादी पार्टी कह रही है कि बैलेट में मतदाताओं की असली पसंद सामने आई। उनके प्रवक्ता उदयवीर सिंह लखनऊ स्नातक सीट की बढ़त का हवाला देकर यहां तक कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ को विधानसभा चुनाव में करारी हार होगी।
सवाल यह है—अगर बैलेट इतना जादुई है, तो कर्नाटक में कांग्रेस क्यों पिट गई? बिहार में राजद और अन्य विपक्षी दल क्यों पिछड़ गए? क्या वहां भी “असली पसंद” एनडीए की थी?
विपक्ष की आदत है कि जब जीतते हैं तो “जनता की जीत” कहते हैं और जब हारते हैं तो मशीन का दोष देते हैं। इस बार मशीन तो थी ही नहीं। फिर भी कई जगह हार हुई। अब किसे दोष देंगे?
शिक्षित मतदाताओं का संदेश
ये चुनाव सामान्य चुनाव नहीं थे। इनमें स्नातक और शिक्षक वोट कर रहे थे—यानी समाज का पढ़ा-लिखा और जागरूक तबका। इन्हीं मतदाताओं के बीच भाजपा और एनडीए ने कई राज्यों में मजबूत प्रदर्शन किया।
भाजपा इसे अपने प्रभाव का प्रमाण बता रही है। और इसमें दम भी है। अगर शिक्षित वर्ग बैलेट पर भी एनडीए को वोट दे रहा है, तो ईवीएम वाले साजिश सिद्धांत की हवा ही निकल जाती है।
विपक्ष के लिए असली सबक
ईवीएम का हल्ला मचाना आसान है। हर हार के बाद मशीन पर सवाल उठाना और राजनीतिक रैली में भीड़ जुटाना और भी आसान है। लेकिन जब बैलेट पेपर से चुनाव हो और फिर भी आप न जीत पाएं, तो सवाल अपने आप पर करना पड़ता है।
क्या संगठन कमजोर है? क्या मुद्दे पुराने पड़ गए हैं? क्या मतदाता अब सिर्फ नारेबाजी से प्रभावित नहीं होते?
विधान परिषद के इन नतीजों ने साफ संदेश दे दिया है—जनता मशीन से नहीं, अपने हिसाब से फैसला करती है। जो दल हर बार हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ते हैं, उन्हें अब आईना दिख गया है।
बैलेट आ गया। नतीजे आ गए। अब मुंह छिपाने की बारी विपक्ष की है।

