Daayra Review: करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन की फिल्म कैसी है?

Daayra Movie Review
शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

डायरेक्टर: मेघना गुलजार स्टारकास्ट: पृथ्वीराज सुकुमारन, करीना कपूर खान, प्रगति मिश्रा, जितेंद्र जोशी, क्षिति जोग श्रेणी: हिंदी, थ्रिलर, क्राइम, ड्रामा अवधि: 2 घंटे 33 मिनट क्रिटिक रेटिंग: 2.5/5

दिसंबर 2019 में हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर से गैंगरेप और हत्या के आरोपियों का एनकाउंटर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। पुलिस ने दावा किया था कि क्राइम सीन रीक्रिएट करने के दौरान आरोपियों ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की, जिसके जवाब में पुलिस को गोली चलानी पड़ी। इस एनकाउंटर ने एक पुरानी बहस छेड़ दी थी—क्या न्याय के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना चाहिए या ‘तुरंत सजा’ ही सही इंसाफ है? निर्देशक मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा’ (Daayra) इसी सत्य घटना और इस वैचारिक बहस को केंद्र में रखकर बुनी गई है।

क्या है ‘दायरा’ की कहानी?

फिल्म की कहानी एक मासूम युवती (प्रगति मिश्रा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने भाई कबीर और मां के साथ रहती है। एक रात, भाई का चश्मा लेकर लौट रही युवती के साथ गैंगरेप किया जाता है और उसे जिंदा जलाकर मार दिया जाता है। इस जघन्य अपराध से पूरा शहर दहल उठता है। पुलिस पर आरोपियों को जल्द पकड़ने का भारी दबाव बनता है। पुलिस चार आरोपियों को गिरफ्तार करती है और वे अपना गुनाह भी कबूल कर लेते हैं।

इसके बाद कहानी में बड़ा मोड़ आता है, जब चारों आरोपियों का एनकाउंटर हो जाता है। जनता इसे ‘तुरंत इंसाफ’ मानकर पुलिस की जय-जयकार करती है। लेकिन, इस एनकाउंटर की जांच के लिए जब एसआईटी (SIT) गठित होती है, तब फिल्म अपने असली मुद्दे पर आती है।

एसआईटी चीफ डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) को शक है कि यह आत्मरक्षा में हुई मुठभेड़ नहीं, बल्कि डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और उनकी टीम द्वारा रची गई एक सुनियोजित हत्या (शूटआउट) थी। इसके बाद फिल्म सच, न्याय, कानूनी खामियों और पीड़ित परिवार के दर्द के बीच उलझती है। यह सवाल उठाती है कि क्या कभी-कभी तत्काल बदला ही इंसाफ का सबसे तेज रास्ता बन जाता है?

डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले: फर्स्ट हाफ में थ्रिल, सेकंड हाफ पड़ा कमजोर

‘तलवार’ और ‘राजी’ जैसी फिल्में बना चुकीं मेघना गुलजार मानवीय संवेदनाओं और सिस्टम की खामियों को दिखाने में माहिर हैं। ‘दायरा’ का फर्स्ट हाफ बेहद चुस्त और प्रभावी है। एफआईआर दर्ज कराने के लिए पीड़ित परिवार को जिस प्रशासनिक और पुलिसिया लापरवाही का सामना करना पड़ता है, उसे बेहद मार्मिक और यथार्थवादी ढंग से दिखाया गया है।

हालांकि, फिल्म का सेकंड हाफ उतना मजबूत नहीं है। कहानी का फोकस जब न्याय व्यवस्था और एनकाउंटर की जांच पर शिफ्ट होता है, तो स्क्रीनप्ले अपनी पकड़ खोने लगता है। जुवेनाइल जस्टिस जैसे संवेदनशील मुद्दे को फिल्म छूती जरूर है, लेकिन उसकी गहराई में नहीं उतरती। पृथ्वीराज और करीना के किरदारों के बीच जिस वैचारिक टकराव की उम्मीद थी, उसे फिल्म पूरी तरह से भुना नहीं पाई।

एक्टिंग: तेज-तर्रार अफसर के रोल में छा गए पृथ्वीराज सुकुमारन

अभिनय की बात करें तो डीसीपी रमन कुमार के रूप में पृथ्वीराज सुकुमारन (Prithviraj Sukumaran) अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। एक फिट और एंग्री पुलिस अफसर के रोल में उनका संयमित, लेकिन भीतर से उबलता आक्रोश पर्दे पर बेहद प्रभावशाली लगता है।

दूसरी तरफ, डीसीपी अजूनी के किरदार में करीना कपूर खान (Kareena Kapoor Khan) काफी सहज नजर आती हैं, लेकिन उनके किरदार को स्क्रीनप्ले से वह गहराई नहीं मिली जो इसे और दमदार बना सकती थी। मां के रोल में क्षिति जोग ने बेटी को खोने के असहनीय दर्द को बखूबी निभाया है। जितेंद्र जोशी और तृप्ति खामकर ने भी सपोर्टिंग रोल्स में अच्छा काम किया है।

क्यों देखें?

अगर आप गंभीर मुद्दों पर बनी क्राइम-थ्रिलर फिल्में देखना पसंद करते हैं, या करीना कपूर, पृथ्वीराज सुकुमारन और मेघना गुलजार के फैन हैं, तो एक बार सिनेमाघर जाकर ‘दायरा’ देखी जा सकती है।