टॉयलेट में भगवान का नाम लेना पाप? प्रेमानंद जी का जवाब जानिए

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

पूजा-पाठ और ईश्वर भक्ति से जुड़े नियमों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में कई तरह के संशय रहते हैं। इनमें एक बड़ा सवाल यह है कि क्या शौच (टॉयलेट) या शारीरिक अशुद्धि के समय भगवान का नाम लिया जा सकता है? सनातन धर्म के शास्त्रों और देश के प्रमुख संतों ने इस विषय पर स्थिति स्पष्ट की है। संतों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मल-मूत्र त्यागते समय होंठ और जीभ हिलाए बिना केवल मानसिक रूप से भगवान का नाम लेना पूरी तरह से शास्त्रसम्मत और कल्याणकारी है।

सनातन दर्शन के अनुसार, असली अपवित्रता काम, क्रोध, लोभ और द्वेष जैसे विकारों से आती है। मल-मूत्र त्यागना शरीर की एक स्वाभाविक प्राकृतिक क्रिया है। संतों का मत है कि यदि उस समय भी मन संसार के विषयों के बजाय ईश्वर के नाम में लगा है, तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से परम पवित्र अवस्था में है।

‘अपवित्रः पवित्रो वा’: क्या कहते हैं शास्त्र?

सनातन ग्रंथों में भगवान और उनके नाम में कोई भेद नहीं माना गया है। शास्त्रों का दृष्टिकोण है कि भगवान का नाम पूरी तरह से दिव्य और चिन्मय है, जिसे संसार की कोई भी गंदगी अपवित्र नहीं कर सकती।

इस संदर्भ में शास्त्रों का एक प्रसिद्ध सूत्र है: “अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥” इसका अर्थ है कि व्यक्ति चाहे पवित्र हो या अपवित्र, अथवा किसी भी अवस्था में हो, यदि वह कमल नयन भगवान श्री हरि का स्मरण करता है, तो वह अंदर और बाहर दोनों से परम पवित्र हो जाता है।

संत प्रेमानंद जी महाराज का संदेश

वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अनुसार, भगवान का नाम लेने के लिए किसी नियम-संयम या नहाने-धोने की कोई शर्त नहीं है।

प्रेमानंद जी का स्पष्ट मत है कि व्यक्ति शौचालय में बैठा हो, बिस्तर पर हो या अस्वस्थ हो, वह हर समय मन ही मन नाम जप कर सकता है। जीवन की अनिश्चितता का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु शौचालय में दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ने से हो जाए, तो उस अंतिम समय में उसका मानसिक नाम जप ही उसकी सद्गति कराएगा। इसलिए, किसी भी अवस्था में भगवान का नाम नहीं छोड़ना चाहिए।

संत एकनाथ और विजय कौशल जी के प्रसंग

महाराष्ट्र के महान संत एकनाथ जी को हर समय ‘विट्ठल-विट्ठल’ जपने की आदत थी। जीवन के एक प्रसंग के अनुसार, एक बार वे इस संकोच में कि शौचालय जैसी अशुद्ध जगह पर भगवान का नाम नहीं लेना चाहिए, अपनी जीभ को हाथ से दबाकर बैठ गए। तब उन्हें यह बोध मिला कि मल-मूत्र का त्याग शरीर का धर्म है, लेकिन आत्मा का धर्म हर समय भगवान से जुड़े रहना है। भगवान का नाम परम पावन है, उसे किसी भी अवस्था में रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

इसी विषय पर संत विजय कौशल जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि शौच क्रिया करते समय मुख से बोलकर नाम लेना वर्जित है। मन की गति को संसार की तरफ ले जाने से बेहतर है कि उसे भगवान के नाम में ही लीन रहने दिया जाए। उनके मुताबिक, इससे कोई पाप नहीं लगता, बल्कि यह निरंतर भक्ति का सूचक है।

मंत्र और भगवन्नाम में मूल अंतर

शास्त्रों में ‘नाम जप’ और ‘मंत्र जप’ के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची गई है।

  • बीज और वैदिक मंत्र: ॐ, गायत्री मंत्र या गुरु मंत्र जैसे वैदिक मंत्रों के उच्चारण के लिए आसन, दिशा, और शारीरिक शुद्धता के कड़े नियम हैं। शौच, स्नान या अपवित्र अवस्था में इन मंत्रों का मानसिक जप भी वर्जित माना गया है क्योंकि ये विशिष्ट ध्वनि विज्ञान और अनुष्ठान से जुड़े हैं।

  • भगवन्नाम: राम, कृष्ण, शिव, नारायण, हरि या राधा जैसे नाम प्रेम और समर्पण के प्रतीक हैं। इनके लिए देश, काल या अवस्था का कोई बंधन नहीं है।

‘अजपा जप’ की अवस्था और नियम

शारीरिक अशुद्धि के समय मानसिक रूप से भगवान का नाम स्वतः चलना अध्यात्म में एक उच्च अवस्था मानी जाती है। संतों ने इसे ‘अजपा जप’ की शुरुआत कहा है। यह वह अवस्था है जहां बिना किसी प्रयास के, श्वास के साथ भीतर ही भीतर भगवान का नाम निरंतर चलता रहता है।

इस दैनिक अभ्यास के लिए दो मुख्य बातों का ध्यान रखने का निर्देश दिया गया है। पहला, शौच या स्नान के समय मौन का पूर्ण पालन होना चाहिए। होंठ, जीभ और कंठ में कोई हलचल नहीं होनी चाहिए; नाम केवल विचारों की तरंग के रूप में चलना चाहिए। दूसरा, आत्मग्लानि का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए। मन में यह संशय नहीं आना चाहिए कि कोई पाप हो रहा है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कलियुग के लिए स्पष्ट निर्देश दिया है—”कलयुग केवल नाम अधारा, सुमर सुमर नर उतरी पारा।” काल का कोई भरोसा नहीं है, इसलिए नाम स्मरण में एक क्षण का भी विराम नहीं होना चाहिए।

लखनऊ के सिद्धेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी भगत राम जी द्वारा बताया गया।