दिवाली पर ज्ञान और जब बकरीद में नदियां लाल हो जाती हैं तो गूंगे हो जाते हैं

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ASHISH SHARMA RISHI
ASHISH SHARMA RISHI

हर साल दिवाली आते ही देश के पर्यावरण प्रेमियों, सेकुलर ज्ञानियों और सोशल मीडिया के सतर्क प्रहरियों का दिल धड़कने लगता है। एसी कमरे से निकलकर वे ट्वीट करते हैं, “पटाखे मत फोड़ो, हवा प्रदूषित हो रही है, बच्चों के फेफड़े खराब हो रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है।” दिल्ली का एक्यूआई 400 पार होते ही वे राष्ट्रपिता बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट, सीपीसीबी, ग्रीन क्रैकर्स, जीआरएपी—सब याद आ जाता है।

आंकड़े भी उनके साथ हैं। दिल्ली में दिवाली के आसपास वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर 300 से 450 के बीच पहुंच जाता है। 2025 में दिवाली वाले दिन औसत एक्यूआई 345 रहा और अगले दिन 351। कुछ इलाकों में पीएम 2.5 की मात्रा 675 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गई। 2026 में दिवाली से पहले ही एक्यूआई 369-382 के आसपास था और त्योहार के दिन कई स्टेशनों पर 400-480 के ‘सीवियर’ स्तर पर पहुंच गया। ये आंकड़े सीपीसीबी के हैं, हर साल दोहराए जाते हैं।

अब थोड़ा बकरीद की तरफ नजर घुमाइए।

बेंगलुरु में बकरीद के दिन लगभग तीन लाख जानवर काटे जाते हैं और करीब 400 टन पशु अपशिष्ट पैदा होता है। खून और अवशेष नालों में बहकर झीलों और जल स्रोतों में चले जाते हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट इस लोड को संभाल नहीं पाते। महाराष्ट्र के मालेगांव में 2026 की बकरीद के बाद मोसम नदी का पानी खून से लाल हो गया। स्थानीय लोगों ने शिकायत की, तनाव बढ़ा, पुलिस बल तैनात करना पड़ा। ये कोई नई घटना नहीं। हर साल कई शहरों में नाले और नदियां कुछ घंटों के लिए लाल हो जाती हैं। यमुना और गंगा में भी कुर्बानी का खून पहुंचने की शिकायतें पुरानी हैं। एनजीटी की कमेटियां भी निर्देश जारी कर चुकी हैं कि खून नदियों में न जाए।

लेकिन यहां ज्ञान देने वालों की जुबान अचानक बंद हो जाती है।

दिवाली पर जो लोग “पर्यावरण की रक्षा” का भाषण देते हैं, वे बकरीद पर या तो चुप रहते हैं या कहते हैं—“ये उनकी धार्मिक परंपरा है, इसमें दखल मत दो।” हवा का प्रदूषण तो राष्ट्रीय आपदा है, लेकिन नदी का खून से लाल होना ‘सांस्कृतिक विविधता’ हो जाता है। एक तरफ पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और ग्रीन क्रैकर का ज्ञान, दूसरी तरफ सैकड़ों टन खून और अवशेष बिना किसी बड़े अभियान के नालों में समा जाते हैं।

मजे की बात यह है कि वायु प्रदूषण के आंकड़े हर घंटे अपडेट होते हैं, हर न्यूज चैनल पर चर्चा होती है। जल प्रदूषण के इन मौसमी प्रकरणों का कोई राष्ट्रीय ‘रियल टाइम डैशबोर्ड’ नहीं बनता। शायद इसलिए कि कुछ प्रदूषण ‘सेकुलर’ होते हैं और कुछ ‘सांप्रदायिक’।

ज्ञान देने वाले भूल जाते हैं कि पर्यावरण न तो हिंदू है, न मुस्लिम। नदी लाल हो या आसमान काला—दोनों ही प्रदूषण हैं। लेकिन चयनात्मक आक्रोश इतना मजबूत है कि दिवाली पर तो वे राष्ट्रहित की बात करते हैं और बकरीद पर अचानक धर्मनिरपेक्षता की याद आ जाती है।

अगर सच में पर्यावरण की चिंता है तो दोनों त्योहारों पर समान मानक रखिए। नहीं तो कम से कम इतना तो स्वीकार कर लीजिए कि आपका ज्ञान मौसम और कैलेंडर देखकर आता है। हवा गंदी हो तो ज्ञान, पानी खूनी हो तो मौन—यही तो असली प्रदूषण है।