राम बहादुर पासी का सपा में आना: बीजेपी के लिए चुपके से बड़ा झटका

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सुरेन्द्र दुबे ( पोलिटिकल एक्सपर्ट)
सुरेन्द्र दुबे 

उत्तर प्रदेश की सियासत में सोमवार को एक घटना हुई जो सामान्य दल-बदल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। पूर्व आईएएस अधिकारी राम बहादुर पासी, जो कभी मायावती के करीबी माने जाते थे और 2022 में भाजपा में शामिल हुए थे, अब अखिलेश यादव की मौजूदगी में समाजवादी पार्टी में चले गए।

यह सिर्फ एक नेता का जाना-आना नहीं है। यह बीजेपी के लिए दलित वोट बैंक, खासकर गैर-जाटव तबके में बढ़ती दरार का संकेत है। और सपा के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम।

पासी समाज: यूपी की चुनावी कुंजी

पासी समुदाय उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों में दूसरा सबसे बड़ा समूह है। 2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में इनकी संख्या लगभग 65.22 लाख है। दलित आबादी का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा पासी समुदाय का है।

विभिन्न अनुमानों के मुताबिक, पासी मतदाता राज्य की कुल मतदाता सूची का 4 से 9 प्रतिशत तक हिस्सा हो सकते हैं। अवध और पूर्वांचल के लगभग 100 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी निर्णायक भूमिका है। जहां जाटव वोट पारंपरिक रूप से बसपा के करीब रहे हैं, वहीं पासी और अन्य गैर-जाटव दलित समुदाय पिछले चुनावों में भाजपा की ओर शिफ्ट हुए थे। 2024 लोकसभा चुनाव में गैर-जाटव दलित वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी में गिरावट देखी गई थी।

राम बहादुर पासी ठीक इसी तबके के चेहरे हैं। प्रशासनिक अनुभव, मायावती से नजदीकी और भाजपा में कुछ समय बिताने के बाद अब सपा में आना—यह संदेश देता है कि दलित समाज के एक महत्वपूर्ण हिस्से में असंतोष बढ़ रहा है।

सपा को कितना फायदा?

अखिलेश यादव ने स्वागत करते हुए कहा—“इनके नाम में राम है, इनके जुड़ने से सारे काम बनेंगे।” यह सिर्फ मजाक नहीं था।

  • पीडीए को मजबूती: सपा पहले से यादव और मुस्लिम वोट पर निर्भर रही है। दलित चेहरे जोड़कर वह बसपा के कमजोर पड़ते वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
  • प्रतीकात्मक प्रभाव: एक पूर्व आईएएस और पासी समुदाय के सम्मानित व्यक्ति का आना, अन्य दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी आकर्षित कर सकता है।
  • संगठनात्मक लाभ: राम बहादुर का प्रशासनिक बैकग्राउंड और समाज में पहुंच सपा को जमीनी स्तर पर मदद करेगी, खासकर अवध क्षेत्र में।

2027 के चुनाव में अगर सपा पासी वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींच लेती है, तो कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं।

बीजेपी ने क्या खोया?

यहां असली कहानी बीजेपी के नुकसान की है।

  1. गैर-जाटव दलित वोट का बिखराव: भाजपा ने 2014 के बाद जाटव के अलावा अन्य दलित समुदायों (पासी, धोबी, कोरी, वाल्मीकि आदि) में अच्छी पैठ बनाई थी। राम बहादुर जैसे चेहरे का जाना इस पैठ में दरार का संकेत है।
  2. विश्वास का संकट: जो नेता 2022 में भाजपा में आए, वे अगर चार साल बाद ही पार्टी छोड़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि पार्टी के अंदर सम्मान, जगह या प्रभाव की कमी महसूस हो रही है। कुशाग्र सागर जैसे पूर्व विधायक भी इसी दौरान सपा में गए।
  3. चुनावी मनोविज्ञान: दलित समुदाय में यह संदेश जाएगा कि भाजपा में आने के बाद भी पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। वहीं सपा “हमारे समाज का सम्मान” का नैरेटिव मजबूत करेगी।
  4. प्रतिद्वंद्वी को ताकत: हर ऐसा नेता जो भाजपा छोड़कर सपा जाता है, वह सिर्फ वोट ही नहीं ले जाता, बल्कि पार्टी के अंदर असंतोष की चर्चा भी बढ़ाता है।

भाजपा लंबे समय से दलित वोट को हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश करती रही है। लेकिन जब समुदाय के प्रभावशाली चेहरे पार्टी छोड़ने लगें, तो यह रणनीति पर सवाल खड़े करता है।

राम बहादुर पासी का सपा में जाना अकेले में कोई भूकंप नहीं है। लेकिन यह उस बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जिसमें सपा पीडीए के जरिए दलित वोट को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है और भाजपा के गठबंधन में दरारें दिखने लगी हैं।

2027 के चुनाव में पासी समुदाय की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाली है। बीजेपी के लिए यह चेतावनी है कि सिर्फ सत्ता और योजनाएं काफी नहीं हैं—समुदायों के अंदर सम्मान और प्रतिनिधित्व का भाव बनाए रखना भी जरूरी है।

सपा के लिए यह मौका है। बीजेपी के लिए यह चेतावनी। और यूपी की सियासत के लिए यह एक और दिलचस्प अध्याय।