Form 6 विवाद क्या है और CJI की टिप्पणी के बाद ज्ञानेश क्यों निशाने पर हैं

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी ने सियासी हलचल तेज कर दी है। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि ‘कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है’। अदालत के इस रुख के सामने आने के बाद कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) सहित कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग (ECI) पर निशाना साधा है। विपक्ष ने सीईसी पर अदालत के नाम का गलत इस्तेमाल करने और युवा मतदाताओं को जानबूझकर मतदान प्रक्रिया से दूर रखने का आरोप लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी और वकीलों की दलील

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से पेश वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि नए वोटरों को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ में बदलाव किया गया है।

इस दलील पर संज्ञान लेते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “फॉर्म 6 में बदलाव को कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। रिकॉर्ड सामने आने पर देखा जाएगा कि यह बदलाव किसने किया?” शीर्ष अदालत की इस सीधे टिप्पणी ने मामले को पूरी तरह से नया मोड़ दे दिया है।

विपक्ष का तीखा हमला: ‘Gen Z को रोकने की साजिश’

अदालत की इस टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया कि सीईसी ने जानबूझकर फॉर्म 6 में बदलाव किया है। उनके मुताबिक, “यह साफ और स्पष्ट है कि सीईसी ने झूठ बोला। सीईसी ने खुद जानबूझकर फॉर्म 6 में बदलाव किया ताकि जेन Z (Gen Z) वोटरों के नाम हटाए जा सकें, जिनसे प्रधानमंत्री बुरी तरह डरे हुए हैं।”

वहीं, सीजेपी के संयोजक अभिजीत दीपके ने सीजेआई के बयान का हवाला देते हुए इसे गैर-कानूनी कदम करार दिया। उन्होंने कहा, “जो भी चीज कानून के मुताबिक नहीं पाई जाती, उसे गैर-कानूनी कहा जाता है, और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति पर उसी के अनुसार आरोप लगाया जाना चाहिए।”

ECI की प्रेस रिलीज और उसे हटाए जाने पर उठे सवाल

विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की पिछली प्रेस रिलीज को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। सीजेपी के संस्थापक सदस्य सौरव दास ने दावा किया कि बाकी दो चुनाव आयुक्तों ने भी फॉर्म में किए गए बदलाव पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि इससे नए वोटरों को परेशानी हो रही थी और उन्हें रजिस्टर होने से रोका जा रहा था।

सौरव दास ने कहा कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में मामले का खुलासा होने के ठीक एक दिन बाद, 26 सितंबर को चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज में यह दावा किया गया था कि “SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के लिए फॉर्म 6 के साथ लगे डिक्लेरेशन को SC ने सही ठहराया है।” लेकिन, सीजेआई सूर्यकांत ने इससे इनकार कर दिया है।

पार्टी नेता आशुतोष रांका ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए दावा किया कि 26 सितंबर की वह प्रेस रिलीज अब चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट से हटा दी गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सीईसी ने देश की जनता से आधिकारिक तौर पर झूठ बोला है।

क्या है फॉर्म 6 विवाद और चुनाव आयोग का पक्ष?

फॉर्म 6 का इस्तेमाल वोटर लिस्ट में नया नाम जोड़ने के लिए किया जाता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि ‘SIR’ प्रक्रिया के दौरान इस फॉर्म में बदलाव किया गया, जिसके तहत नए वोटर्स को अपने, माता-पिता या दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड से संबंध बताना अनिवार्य कर दिया गया था। उनका तर्क है कि कानून और चुनाव नियमों में बदलाव के बाद ही फॉर्म में इस तरह का बदलाव किया जा सकता था।

इस पूरे विवाद पर चुनाव आयोग ने पहले ही अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। आयोग का तर्क था कि फॉर्म 6 में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है, बल्कि इसके साथ केवल एक ‘डिक्लेरेशन फॉर्म’ जोड़ा गया है। चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया था कि इस डिक्लेरेशन फॉर्म का इस्तेमाल केवल SIR प्रक्रिया तक ही सीमित है। आयोग के अनुसार, SIR प्रक्रिया खत्म होने के बाद फॉर्म 6 पहले की तरह ही भरा जा सकेगा और नए मतदाता उसी सामान्य प्रक्रिया से अपना नाम जुड़वा सकेंगे।