कथाओं का चुनावी मैदान: 40 साल बाद भी वही पुरानी चाल, नई पैकेजिंग

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सुरेन्द्र दुबे ( पोलिटिकल एक्सपर्ट)
सुरेन्द्र दुबे  

चालीस साल से उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान को कवर कर रहा हूं। 1980 के दशक से लेकर 2022 तक के लगभग हर बड़े चुनाव की धूल चाटी है। रैलियां देखीं, जनसभाएं देखीं, जाति की रंजिशें देखीं और धर्म की लहरें भी। लेकिन 2027 के चुनाव से पहले जो ट्रेंड उभर रहा है, वह पुराने दिनों की याद दिलाता है—बस पैकेजिंग नई है।

अब रैलियों का शोर कम है, पंडालों का शोर ज्यादा। बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन, कथाएं, सत्संग। नेता मंच पर बैठे हैं, भीड़ जुट रही है और सियासत चुपचाप काम कर रही है।

आज का दृश्य

अयोध्या में समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडे श्रीमद् भागवत कथा करवा रहे हैं। चर्चा है कि अखिलेश यादव खुद वहां पहुंच सकते हैं—राम मंदिर दर्शन के बिना। रायबरेली में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय की शिव महापुराण कथा में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहुंचे। राजा भैया नवंबर में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की रामकथा करवाने वाले हैं। बृजभूषण शरण सिंह, दयाशंकर सिंह, नीरज बोरा… सूची लंबी होती जा रही है।

ये सिर्फ भक्ति का मेला नहीं लग रहा। ये चुनावी जनसंपर्क का नया मॉडल है।

पुरानी यादें

मुझे 1989-90 का चुनाव याद आता है। तब मंडल कमीशन की आग जल रही थी। वी.पी. सिंह सरकार के खिलाफ कमंडल की राजनीति जोर पकड़ रही थी। अयोध्या की रथ यात्रा निकली थी। तब भी धर्म और राजनीति का गठजोड़ साफ दिखता था, लेकिन तरीका अलग था। रैलियों में नारे लगते थे, जुलूस निकलते थे।

2002 और 2007 के चुनावों में भी मैंने देखा था कि कैसे कुछ नेता मंदिरों के कार्यक्रमों में चुपचाप पहुंच जाते थे। भीड़ जुटा लेते थे, लेकिन मीडिया के सामने “धर्म” और “राजनीति” को अलग रखने का नाटक करते थे। 2014 और 2017 के बाद खेल बदल गया। हिंदुत्व की पिच इतनी मजबूत हो गई कि अब कोई दल इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

एक पुरानी बात याद आती है। 1990 के दशक में पूर्वांचल के एक नेता ने कहा था—‘रैली में लोग आकर चले जाते हैं, कथा में लोग घंटों बैठते हैं और घर जाकर कहानी सुनाते हैं।’ आज वही बात दोबारा सच होती दिख रही है।

अनुभव की बात

चालीस साल में एक बात बार-बार देखी है। उत्तर प्रदेश में धर्म कभी चुनावी मुद्दा नहीं रहा, वह हमेशा चुनावी माध्यम रहा है। कभी यह कमंडल बना, कभी राम मंदिर, कभी गौ रक्षा। आज कथाएं उसी श्रृंखला की नई कड़ी हैं।

नेता समझ गए हैं कि 2027 का युवा वोटर पुरानी ‘जंगलराज’ वाली कहानियां उतनी गंभीरता से नहीं लेगा। लेकिन भक्ति और आस्था की भाषा अभी भी घरों तक पहुंचती है। इसलिए पंडाल सज रहे हैं, कथाएं हो रही हैं और नेता मालाएं पहनकर मंच पर बैठे हैं।

अंत में एक पुरानी कहावत याद आती है, जो चुनावी मैदान में अक्सर सुनने को मिलती थी—‘वोट बैंक में जात भी जाती है, धर्म भी जाता है। लेकिन जो दोनों को एक साथ साध ले, वही जीतता है।’

2027 से पहले उत्तर प्रदेश के मैदान में यही प्रयोग चल रहा है। रैलियों का शोर बाद में आएगा। अभी पंडालों का शोर ज्यादा है। और यह शोर महज भक्ति का नहीं, सियासत का भी है।