घंटी, अजान और चर्च बेल: धर्मों ने कैसे जोड़ी सामूहिक प्रार्थना की कड़ी

मानव सभ्यता के आरंभ से ही समुदाय को एक जगह एकत्र करने के लिए ध्वनि-संकेतों का इस्तेमाल होता रहा है। समय के साथ यह जरूरत धार्मिक जीवन का एक अहम हिस्सा बन गई। पूजा, प्रार्थना या संगति के समय को सूचित करने के लिए हिंदू धर्म में मंदिर की घंटी, इस्लाम में अजान, ईसाई धर्म में चर्च की घंटियां और सिख धर्म में नगाड़ा व अरदास की परंपराएं विकसित हुईं। इन सभी का मूल उद्देश्य समुदाय को दिव्य उपस्थिति की ओर बुलाना है।
हिंदू परंपरा में घंटे का महत्व और स्कंद पुराण का जिक्र
हिंदू मंदिरों में घंटा बजाने की परंपरा वैदिक साहित्य और आगम शास्त्रों जितनी प्राचीन है, जहां ध्वनि को पवित्र माना गया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि पूजा के समय घंटानाद करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। वहीं, ब्रह्म पुराण में इंद्र के ऐरावत हाथी की गर्दन की घंटी को कृष्ण को अर्पित करने का प्रसंग है, जिसे मंदिर पूजा में घंटे के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर के गर्भगृह या प्रवेश द्वार पर लटके घंटे को भक्त प्रवेश करते समय बजाकर देवता को अपनी उपस्थिति सूचित करता है। आमतौर पर पांच या सात धातुओं से बनने वाले इन घंटों की ध्वनि को नकारात्मक शक्तियों को दूर करने, मन को एकाग्र करने और ‘ॐ’ जैसी पवित्र कंपन उत्पन्न करने वाला माना जाता है। यह अनुष्ठान का अभिन्न अंग है, जिसका उपयोग आरती, अभिषेक और यज्ञ के दौरान भी होता है।
इस्लाम में अजान की शुरुआत और इंसानी आवाज को प्राथमिकता
इस्लाम में अजान का आरंभ मदीना में हिजरत के बाद (लगभग 622 ईस्वी) हुआ। प्रारंभिक दौर में प्रार्थना के समय को लेकर अनिश्चितता थी। कुछ साथियों ने ईसाइयों की तरह घंटी और यहूदियों की तरह शोफर (सींग) के इस्तेमाल का सुझाव दिया था, लेकिन पैगंबर मुहम्मद ने इसे स्वीकार नहीं किया।
हदीस के अनुसार, अब्दुल्लाह इब्न ज़ैद को स्वप्न में अजान के शब्द सुनाई दिए थे, जिसे पैगंबर ने सत्य स्वप्न माना। इसके बाद मधुर स्वर वाले बिलाल इब्न रबाह को प्रथम मुअज्जिन नियुक्त किया गया, जिन्होंने मस्जिद की छत से पहली अजान दी। इसमें “अल्लाहु अकबर” और “हय्य अलास-सलाह” (प्रार्थना की ओर आओ) जैसे वाक्यों का उपयोग किया गया। अजान में यांत्रिक ध्वनियों के बजाय मानवीय आवाज को प्राथमिकता दी गई, ताकि यह सीधे हृदय तक पहुंचे।
चर्च में घंटियों का इतिहास और आधिकारिक मान्यता
ईसाई परंपरा में चर्च घंटियों का व्यवस्थित उपयोग लगभग पांचवीं शताब्दी में शुरू हुआ। इटली के नोला के बिशप पौलिनस (लगभग 400 ईस्वी) ने सबसे पहले चर्च में घंटियों का प्रयोग किया, जिसे बाद में 604 ईस्वी में पोप सबिनियानस ने आधिकारिक मान्यता दी।
पुराने नियम (निर्गमन 28) में महायाजक के वस्त्र पर छोटी घंटियां लगाने का जिक्र मिलता है, लेकिन बड़े चर्च घंटों का विकास मुख्य रूप से ईसाई परंपरा की देन है। मध्य युग तक ये यूरोप के चर्चों में आम हो गईं। इनका इस्तेमाल कैनोनिकल आवर्स (निश्चित प्रार्थना समय), जन्म-मरण और सामुदायिक घटनाओं की सूचना देने के लिए किया जाने लगा। शुरुआत में इनकी ध्वनि को बुरी आत्माओं को भगाने वाला माना जाता था और बाद में इससे जुड़ी ‘चेंज-रिंगिंग’ कला भी विकसित हुई।
सिख धर्म में ‘रंजीत नगाड़ा’ और अरदास की परंपरा
सिख धर्म में संगत को बुलाने के लिए नगाड़े का प्रमुखता से उपयोग होता है। गुरु गोबिंद सिंह ने 1684 में आनंदपुर में ‘रंजीत नगाड़ा’ स्थापित किया था, जो शाही प्रतीक होने के साथ-साथ संगत को एकत्र करने का माध्यम भी था। आज लगभग हर गुरुद्वारे में अरदास और लंगर की सूचना के लिए नगाड़ा बजाया जाता है।
अरदास अपने आप में कोई आह्वान नहीं, बल्कि एक औपचारिक सामूहिक प्रार्थना है, जिसका आरंभिक भाग गुरु गोबिंद सिंह रचित ‘चंडी दी वार’ से लिया गया है। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से पहले या बाद में संगत द्वारा खड़े होकर की जाने वाली इस प्रार्थना में दस गुरुओं, शहीदों और खालसा पंथ का स्मरण किया जाता है।
आस्था के इन ध्वनि-संकेतों में समानता और अंतर
इन चारों धार्मिक परंपराओं में यांत्रिक ध्वनि (घंटी, नगाड़ा) और मानवीय स्वर (अजान, अरदास) दोनों का स्पष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। हिंदू परंपरा में जहां घंटा व्यक्तिगत भक्ति से जुड़ा है, वहीं इस्लाम में अजान सामूहिक नमाज की घोषणा है।
ईसाई घंटियां समय के साथ सामुदायिक जीवन की घड़ी के रूप में विकसित हुईं, जबकि सिख परंपरा में नगाड़ा और अरदास ऐतिहासिक बलिदान और वर्तमान प्रार्थना को एक साथ जोड़ते हैं। समय के साथ इन ध्वनि-संकेतों ने केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण किए हैं।

