श्रीकृष्ण विराजमान की पैरवी कौन करेगा? हिंदू पक्ष में सहमति नहीं

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद (Krishna Janmabhoomi Case) की कानूनी लड़ाई में एक नई अड़चन आ गई है। सुप्रीम कोर्ट में हुई ताजा सुनवाई के दौरान हिंदू याचिकाकर्ताओं के अलग-अलग गुटों के बीच इस बात पर आम राय नहीं बन पाई कि अदालत में ‘श्री कृष्ण विराजमान’ की ओर से पक्षकार का प्रतिनिधित्व कौन करेगा। हिंदू पक्षों के बीच इस मतभेद पर सर्वोच्च अदालत ने गहरी नाराजगी जताते हुए तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला बार-बार अटक रहा है और इसमें सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ (Tareekh Pe Tareekh) पड़ रही है। मामले की अगली सुनवाई अब 6 नवंबर को होगी।

“सह-वादी आपस में समझौता करके आएं…”

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि पिछली सुनवाई में हिंदू याचिकाकर्ताओं को आपसी सहमति बनाने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था। अदालत चाहती थी कि सभी पक्ष मिलकर यह तय कर लें कि ‘श्री कृष्ण विराजमान’ का प्रतिनिधित्व कौन करेगा, ताकि कानूनी प्रक्रिया सुचारू रूप से आगे बढ़ सके।

हालांकि, अदालत को यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू पक्ष के विभिन्न गुट इस महत्वपूर्ण बिंदु पर किसी भी समझौते तक नहीं पहुंच सके हैं। इस पर निराशा व्यक्त करते हुए अदालत ने कहा, “हमें पहले यह आश्वासन दिया गया था कि सभी सह-वादी (Co-plaintiffs) आपस में एक साझा समझ बनाकर कोर्ट के सामने आएंगे, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ।”

“यह मामला अभिशप्त सा लगता है…”

जब अदालत में सहमति न बनने की बात सामने आई, तो हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने दलील दी, “ऐसा नहीं है, हम सभी मूल रूप से एक ही पक्ष में हैं। लेकिन हां, इस मौजूदा स्थिति के साथ यह मामला आगे नहीं बढ़ सकता।”

वरिष्ठ वकील की इस दलील पर अदालत ने तल्ख लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर आप लोग आपस में तय नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर हमें ही दोनों पक्षों की दलीलें सुननी होंगी। हम आप सभी को विस्तार से सुनेंगे। वैसे भी, यह पूरा मामला अब अभिशप्त सा प्रतीत होता है, यहां सिर्फ तारीख पर तारीख ही पड़ रही हैं।”

अब 6 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

हिंदू पक्षों के बीच आम सहमति बनाने के प्रयास विफल होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 6 नवंबर की तारीख मुकर्रर की है। 6 नवंबर की सुनवाई काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि कोर्ट अब आपसी सहमति का और इंतजार करने के बजाय, खुद ही इस कानूनी पेंच को सुलझाने के लिए सीधे दलीलें सुनना शुरू करेगा। पक्षकारों के बीच इस तरह की कानूनी अड़चनों के कारण लंबे समय से लंबित यह संवेदनशील और महत्वपूर्ण विवाद एक बार फिर आगे खिंच गया है।