सीटों की खींचतान शुरू, RLD-निषाद-राजभर की दावेदारी क्या कहती है?

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सीटों की सियासी सौदेबाजी का पहला दौर अभी से शुरू हो गया है। 403 विधानसभा सीटों वाले इस सियासी सूबे में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के छोटे सहयोगी दल—निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP), अपना दल (सोनेलाल) और राष्ट्रीय लोकदल (RLD)—ने अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में हिस्सेदारी मजबूत करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

सहयोगी दलों की इस समय से पहले शुरू हुई मांग ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भाजपा अपने सहयोगियों की महत्वाकांक्षाओं और अपनी चुनावी रणनीति के बीच तालमेल कैसे बनाएगी।

चुनाव से पहले ही सीटों की सौदेबाजी तेज

आमतौर पर किसी भी गठबंधन में सीटों के बंटवारे पर अंतिम मुहर चुनाव की तारीखों के नजदीक लगती है। इसके विपरीत, यूपी में सहयोगी दल अभी से अपनी उपयोगिता साबित कर सौदेबाजी की टेबल पर अपना पलड़ा भारी करने में जुटे हैं।

जून के महीने में ही निषाद पार्टी और सुभासपा के नेताओं ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से सीटों के बंटवारे पर समय रहते स्पष्टता लाने की मांग रखी थी। सहयोगी दलों का सीधा मानना है कि जो दल जितनी जल्दी अपनी संगठनात्मक ताकत और वोट बैंक का प्रदर्शन करेगा, गठबंधन में उसकी हिस्सेदारी उतनी ही मजबूत मानी जाएगी।

संजय निषाद के दोहरे संकेत और राजनीतिक मुलाकातें

सहयोगी दलों में सबसे मुखर रुख फिलहाल निषाद पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद का दिख रहा है। संजय निषाद 2027 के चुनाव में 2022 की तुलना में ज्यादा सीटों की मांग पर अड़े हैं।

दबाव बनाने की इस रणनीति के तहत उन्होंने यह तक कह दिया था कि अगर भाजपा उनके लिए रास्ते बंद करती है, तो उनकी पार्टी दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। हालांकि बाद में उन्होंने भाजपा से अलग होने की संभावनाओं को खारिज करते हुए निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा दिलाने के लिए भाजपा को ही एकमात्र सक्षम दल बताया। इसी सियासी हलचल के बीच संजय निषाद की समाजवादी पार्टी के नेता माता प्रसाद पांडेय से हुई शिष्टाचार भेंट ने भी राजनीतिक गलियारों में अटकलों को हवा दी।

निषाद समुदाय से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और विभिन्न दलों की सक्रियता के बाद निषाद पार्टी सीटों के साथ-साथ समाज के प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का सवाल उठाकर अपने दावे को मजबूत कर रही है।

पूर्वांचल में राजभर की तैयारी और पश्चिमी यूपी में RLD का गणित

दूसरी तरफ, पूर्वांचल में प्रभाव रखने वाली ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा ने भी अपनी सियासी जमीन के हिसाब से दावेदारी शुरू कर दी है। राजभर ने स्पष्ट किया था कि उनकी पार्टी 43 सीटों पर चुनावी तैयारी में जुटी है और सीटों के औपचारिक बंटवारे पर आगे चर्चा होगी।

पूर्वांचल की सियासत में भाजपा के सामने सबसे बड़ा पेंच यह है कि वहां कई सीटों पर निषाद पार्टी, सुभासपा, अपना दल (एस) और खुद भाजपा का मजबूत दावा टकराता है:

  • पूर्वांचल का टकराव: एक ही सीट पर जहां भाजपा का संगठन मजबूत है, वहीं सामाजिक आधार के दम पर सहयोगी दल भी टिकट मांग रहे हैं।

  • 2022 का सबक: 2022 के चुनाव में जहां भाजपा कुछ सीटों पर कमजोर रही थी, सहयोगी दल उन सीटों को 2027 में अपने लिए बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं।

  • पश्चिमी यूपी का समीकरण: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल (RLD) अपने राजनीतिक आधार और उपयोगिता के हिसाब से अपनी हिस्सेदारी चाहेगा, जबकि अपना दल (एस) भी अपने परंपरागत कुर्मी-पटेल बाहुल्य वाले इलाकों में सीटें छोड़ने के मूड में नहीं है।

भाजपा की मजबूरी और सहयोगियों की सीमा

भाजपा के लिए सहयोगियों को साथ रखना सिर्फ संख्या का खेल नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने का जरिया है। भाजपा सरकार और संगठन के स्तर पर मछुआरों, छोटे किसानों, पूर्व सैनिकों और विभिन्न जातियों को जोड़ने के अभियान में जुटी है। ऐसे में निषाद, राजभर, पटेल और जाट जैसे सामाजिक समूहों से जुड़े दल इस व्यापक सामाजिक गठबंधन का आधार बनते हैं।

लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों के सामने चुनौती यह परखने की होगी कि सहयोगी दलों की मांग उनके वास्तविक जमीनी प्रभाव से कितनी मेल खाती है। किसी समुदाय में राजनीतिक प्रभाव होना और उस प्रभाव को सीधे विधानसभा सीटों की जीत में बदल पाना दो अलग बातें हैं।

आगामी दौर की वार्ताओं में केवल जातीय समीकरण ही नहीं, बल्कि पिछला चुनावी रिकॉर्ड, स्थानीय संगठन और दोनों दलों के संयुक्त वोटों को ट्रांसफर कराने की क्षमता ही सीटों के अंतिम बंटवारे का मुख्य पैमाना बनेगी।