रामजी गौतम का बढ़ता कद, बसपा और कांशीराम की विरासत पर सवाल

बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम ने जब इस आंदोलन की नींव रखी थी, तब उनका स्पष्ट संदेश था—’परिवारवाद इस आंदोलन का सबसे बड़ा दुश्मन है। रिश्तेदारों को पार्टी में पद और टिकट नहीं मिलने चाहिए।’ उनका मानना था कि आंदोलन विचारधारा (Ideology) से चलना चाहिए, न कि खून के रिश्तों से। लेकिन आज वही पार्टी परिवारवाद, विश्वासपात्रों की खींचतान और अंतहीन आंतरिक कलह में उलझी हुई नजर आ रही है।
भतीजे आकाश आनंद (Akash Anand) को बार-बार पद देना, फिर उन्हें परिपक्वता की कमी बताकर हटाना और अब पूरी तरह से ‘आजाद’ कर देना—बसपा के मौजूदा राजनीतिक संकट का सबसे तीखा उदाहरण है। इस पूरे नाटक के बीच एक नाम जो लगातार मजबूत होकर उभरा है, वह है—राज्यसभा सांसद रामजी गौतम (Ramji Gautam)।
आकाश-ईशान का विवाद: परिवार बनाम पार्टी का संकट
आकाश आनंद को कभी मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। लेकिन सितंबर 2026 में मायावती ने यह कहते हुए उन्हें पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया कि वह (आकाश) पार्टी से ज्यादा अपने ससुर (अशोक सिद्धार्थ) के प्रभाव में हैं। नौबत यहां तक आ गई कि ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से संन्यास लेने तक को कह दिया गया।
मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को साफ संदेश दे दिया कि वह चाहें तो अपनी बेटी दीपिका को साथ रख सकते हैं, लेकिन बेटों को आगे बढ़ाने का रास्ता अब बंद हो चुका है। यह सिर्फ एक परिवार का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि यह उस बहुजन आंदोलन का संकट है जो कभी दलित अस्मिता की सबसे बुलंद आवाज हुआ करता था।
कौन हैं रामजी गौतम? संघर्ष से उदय और बढ़ता कद
रामजी गौतम लखीमपुर खीरी के एक साधारण जाटव परिवार से आते हैं। 1990 के दशक में वह कांशीराम और अंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर बसपा से जुड़े थे।
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जमीनी कार्यकर्ता से सांसद तक: बूथ स्तर से शुरुआत करने वाले गौतम संगठन में लंबे समय तक काम करने के बाद 2020 में राज्यसभा पहुंचे।
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मायावती का भरोसा: मायावती उन्हें अपना ‘भाई’ कहती रही हैं। सूत्रों की मानें तो जब भी अशोक सिद्धार्थ या आकाश आनंद का प्रभाव बढ़ा, रामजी गौतम का कद घटा। लेकिन जब उन पर (आकाश-अशोक) कार्रवाई हुई, तो गौतम को 10 राज्यों का अहम ‘सेक्टर प्रभारी’ बना दिया गया।
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चर्चा यहां तक है कि मायावती के कानों तक यह बात पहुंचाने में गौतम का ही अहम रोल रहा कि “अगर आकाश को रखना है, तो ससुर को राजनीति छोड़नी होगी।” रामजी गौतम आज उस व्यवस्था के प्रतीक बन गए हैं, जहां परिवार से बाहर का एक नेता परिवार के सदस्यों से ज्यादा भरोसेमंद साबित हो रहा है।
कांशीराम की नीति और मायावती का राजनीतिक भटकाव
कांशीराम ने जीवन भर अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा। मायावती ने भी लंबे समय तक इसी परंपरा का पालन किया। लेकिन धीरे-धीरे भाई, भतीजे, ससुर और साले बसपा के सत्ता केंद्र में आ गए। आज वही परिवार पार्टी के लिए बोझ बन गया है।
आकाश आनंद जैसे युवा नेता को मौका मिलना एक सकारात्मक कदम हो सकता था, लेकिन परिवार के रिश्तों और गुटबाजी ने उन्हें निगल लिया। वहीं, रामजी गौतम जैसे संगठनात्मक नेताओं ने खुद को मजबूत कर लिया। मायावती के इस भटकाव से बसपा का ग्राफ लगातार गिर रहा है। कार्यकर्ता अब पूछने लगे हैं कि कांशीराम का आंदोलन आखिर कहां गया?
अगर मायावती सच में कांशीराम के दिखाए रास्ते पर चलना चाहती हैं, तो उन्हें पार्टी को परिवार और चंद विश्वासपात्रों की जागीर बनने से रोकना होगा, अन्यथा बहुजन समाज अपना नया राजनीतिक घर खोजने को मजबूर हो जाएगा।
