UCC लागू करने में क्या अड़चन? सामने हैं ये प्रशासनिक चुनौतियां

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरे देश में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ (UCC – समान नागरिक संहिता) लागू करने का ऐलान राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मचा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 21 राज्यों में इसे लागू करने वाले बयान के बाद विपक्ष और कुछ सहयोगी दल भी इस पर अपनी असहमति जता चुके हैं।
एक तरफ इसे राष्ट्रीय एकता और महिला समानता (Women Empowerment) की दिशा में मील का पत्थर बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अतिक्रमण करार दिया जा रहा है। इतने बड़े सामाजिक-कानूनी बदलाव सिर्फ राजनीतिक घोषणाओं से जमीन पर नहीं उतरते। इसके लिए गहरी प्रशासनिक क्षमता, संवेदनशीलता और जमीनी हकीकत को समझना बेहद जरूरी है।
वर्तमान व्यवस्था की हकीकत और संवैधानिक स्थिति
भारत में आपराधिक (Criminal) और कराधान (Tax) कानून सभी नागरिकों के लिए एक समान हैं। लेकिन विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में धर्म और समुदाय आधारित अलग-अलग ‘पर्सनल लॉ’ लागू होते हैं।
-
हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय हिंदू मैरिज और सक्सेशन एक्ट के दायरे में आते हैं।
-
मुस्लिमों के लिए शरियत आधारित कानून हैं, ईसाइयों और पारसियों के अपने कोड हैं, और कई आदिवासी समुदायों के अपने पारंपरिक रीति-रिवाज हैं।
संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने की बात जरूर करता है, लेकिन यह एक नीति निर्देशक तत्व (Directive Principle) है, बाध्यकारी मौलिक अधिकार नहीं। वहीं, अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 29 (सांस्कृतिक संरक्षण) अल्पसंख्यकों और समुदायों को उनकी पहचान बनाए रखने की गारंटी देते हैं। संविधान निर्माताओं ने भारत की इस जटिल सामाजिक बनावट को समझते हुए ही इस व्यवस्था को लचीला रखा था।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से UCC की बड़ी चुनौतियां
यूसीसी को लागू करने की बात आते ही सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हमारा प्रशासनिक ढांचा इसके लिए तैयार है?
-
सिस्टम का पुनर्प्रशिक्षण: विवाह पंजीकरण, उत्तराधिकार के दावे और तलाक की कार्यवाही स्थानीय स्तर पर हजारों तहसीलदार, रजिस्ट्रार और अदालतें निपटाती हैं। अचानक एक समान कोड लागू करने का मतलब है पूरे सिस्टम को फिर से प्रशिक्षित करना, नए फॉर्म बनाना और नई प्रक्रियाओं को ढालना।
-
आदिवासी समुदायों की चिंताएं: उत्तराखंड जैसे राज्य में UCC लागू होने के बाद भी आदिवासी समुदायों को इससे छूट दी गई, जो एक व्यावहारिक जरूरत थी। यदि एक वर्ग को संवैधानिक सुरक्षा के नाम पर बाहर रखा जा सकता है, तो अन्य समुदायों की चिंताओं को भी गंभीरता से सुनना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
-
विधि आयोग की रिपोर्ट का अभाव: कई पर्सनल लॉ में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। इसमें सुधार के दो रास्ते हैं—सभी के लिए एक समान कोड, या प्रत्येक पर्सनल लॉ में जेंडर जस्टिस के आधार पर सुधार। 2018 में 21वें विधि आयोग ने दूसरे रास्ते (पर्सनल लॉ में सुधार) को प्राथमिकता दी थी। वहीं, 22वां विधि आयोग बिना अपनी रिपोर्ट सौंपे ही भंग हो गया, जो इस मुद्दे पर प्रशासनिक लापरवाही का साफ संकेत है।
आगे का व्यावहारिक रास्ता क्या होना चाहिए?
इतने बड़े और संवेदनशील बदलाव के लिए जल्दबाजी के बजाय चरणबद्ध दृष्टिकोण (Phase-wise approach) अपनाना जरूरी है:
-
व्यापक संवाद: धार्मिक नेताओं, महिला संगठनों, आदिवासी प्रतिनिधियों, कानूनी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों के साथ गहरी चर्चा होनी चाहिए।
-
पारदर्शिता और पायलट प्रोजेक्ट: मसौदा (Draft) पारदर्शी हो और इसे पहले ‘पायलट प्रोजेक्ट’ के आधार पर कुछ क्षेत्रों में आजमाया जाए।
-
संघीय ढांचे का सम्मान: कई विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र से जुड़े हैं, इसलिए केंद्र को राज्यों की चिंताओं को भी समझना होगा।
राजनीतिक दल इसे चुनावी मुद्दा बना सकते हैं, लेकिन प्रशासन का काम वोट बैंक साधना नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता बनाए रखना है। अगर यूसीसी को बिना व्यापक सहमति के लागू किया गया, तो यह एकता बढ़ाने के बजाय अदालती चुनौतियों, धरना-प्रदर्शन और सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। समय की मांग है कि भावनाओं और जल्दबाजी से ऊपर उठकर प्रशासनिक यथार्थ को देखा जाए, तभी कोई भी बड़ा सुधार टिकाऊ साबित होगा।
