हरिश्चंद्र सिंह ने बताया दलित और सवर्ण के बीच की दीवारें गिराने का रास्ता

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रदेश अध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह ने भारतीय समाज के सबसे संवेदनशील और विवादित मुद्दे ‘आरक्षण’ (Reservation) पर अपनी विस्तृत राय रखी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक तरफ दलित समुदाय आरक्षण को ऐतिहासिक अन्याय का सुधार मानता है, तो दूसरी तरफ सवर्ण वर्ग का एक तबका इसे मौजूदा पीढ़ी के साथ अन्याय के रूप में देखता है। सिंह के मुताबिक, दोनों पक्षों की पीड़ा वास्तविक है, लेकिन इस टकराव को हमेशा के लिए जारी रखना देश या समाज के हित में नहीं है।

कहां है समस्या की असली जड़?

हरिश्चंद्र सिंह ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण से सरकारी नौकरियों और शिक्षा में प्रतिनिधित्व जरूर बढ़ा है, लेकिन असमानता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति (SC) और जनजाति (ST) का नामांकन बढ़ा है, लेकिन संपत्ति, आय और निजी क्षेत्र की अच्छी नौकरियों में अभी भी सवर्णों और ऊपरी जातियों का वर्चस्व है।

उन्होंने बताया कि समस्या तब गंभीर हो जाती है जब आरक्षण को ‘शून्य-योग खेल’ (Zero-Sum Game) मान लिया जाता है—यानी एक की जीत और दूसरे की हार। क्रीमी लेयर की बहस भी इसी तनाव को बढ़ाती है। ओबीसी (OBC) में आर्थिक आधार पर बाहर रखने का प्रावधान है, लेकिन एससी-एसटी में सामाजिक वंचना की गहराई अलग है। आरक्षण का लाभ सबसे जरूरतमंद तक पहुंचना चाहिए, न कि सिर्फ पहले से सक्षम हो चुके वर्ग तक सिमट कर रह जाए।

दलित-सवर्ण के बीच की दूरी मिटाने के 5 समाधान

एनसीपी प्रदेश अध्यक्ष ने समाज में बढ़ती इस खाई को पाटने और आरक्षण व्यवस्था को अधिक तर्कसंगत बनाने के लिए पांच प्रमुख समाधान सुझाए हैं:

  • बुनियादी शिक्षा की मजबूती: प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो। जब नींव मजबूत होगी, तो उच्च शिक्षा और नौकरियों में प्रतिस्पर्धा बराबरी की होगी।

  • निजी क्षेत्र और कौशल विकास: सरकारी नौकरियां सीमित हैं। आरक्षण के साथ-साथ कौशल विकास पर जोर दिया जाए और उद्योग व सेवा क्षेत्र में विविधता (Diversity) बढ़ाई जाए, जिससे सरकारी नौकरियों पर निर्भरता कम हो।

  • आर्थिक और सामाजिक कसौटी का संगम: सबसे पिछड़े और गरीब परिवारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी जाति के हों। उप-वर्गीकरण और समय-समय पर की जाने वाली समीक्षा से आरक्षण का लाभ सही लोगों तक पहुंच सकेगा।

  • राजनीतिक दोहन पर रोक: नेताओं को आरक्षण को सिर्फ वोट बैंक का औजार बनाने से बचना चाहिए। भावनाओं को भड़काने के बजाय आंकड़ों और जमीनी हकीकत पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए।

  • सार्थक संवाद: दलित और सवर्ण युवाओं को एक साथ बैठकर एक-दूसरे की पीड़ा समझने का मौका मिलना चाहिए। जब गरीब सवर्ण की मजबूरी और दलित परिवार की पीढ़ीगत वंचना दोनों को समान रूप से समझा जाएगा, तब आपसी कड़वाहट कम होगी।

आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने या इसे हमेशा के लिए जस का तस रखने की बहस को हरिश्चंद्र सिंह ने गलत ठहराया है। उनका मानना है कि इसे समय के साथ बदलते समाज के अनुकूल, न्यायसंगत और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। जब देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार के अवसर व्यापक हो जाएंगे, तब आरक्षण की आवश्यकता स्वतः ही कम होती जाएगी। समाज तभी असल मायने में मजबूत होगा, जब कोई भी वर्ग पीछे न छूटे और किसी को भी अपने साथ अन्याय होता महसूस न हो।