हरिश्चंद्र का बयान, बोले- ‘हर समुदाय की सबसे कमजोर कड़ी महिलाएं’

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अजमल शाह
अजमल शाह

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रदेश अध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह ने देश में सामाजिक न्याय और समानता की बहस के बीच महिलाओं की जमीनी स्थिति पर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा है कि देश में जब भी विकास की बात होती है, तो चर्चाएं अक्सर जाति और धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि सवर्ण, अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी हो या अल्पसंख्यक समुदाय, हर वर्ग के अंदर सबसे बुरी हालत महिलाओं की ही है।

सेहत के मोर्चे पर चिंताजनक आंकड़े

हरिश्चंद्र सिंह ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों का हवाला देते हुए महिलाओं की सेहत पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि 15 से 49 वर्ष की उम्र वाली लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं।

जातिगत आधार पर इन आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा है कि अनुसूचित जनजाति (ST) की 65 प्रतिशत, अनुसूचित जाति (SC) की 59 प्रतिशत, ओबीसी की 55 प्रतिशत और सामान्य वर्ग की करीब 56 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से जूझ रही हैं। मुस्लिम महिलाओं में भी यह दर काफी ऊंची बनी हुई है। वहीं, पुरुषों में खून की कमी का आंकड़ा महिलाओं के मुकाबले आधे से भी कम है। मातृ स्वास्थ्य और पोषण के मामले में भी महिलाएं पुरुषों से काफी पीछे हैं।

घरेलू हिंसा और सामाजिक दबाव का साया

महिला सुरक्षा का जिक्र करते हुए एनसीपी नेता ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों पर जोर दिया। उनके मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ लगातार अपराध दर्ज हो रहे हैं, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू क्रूरता का है।

सिंह ने स्पष्ट किया कि यह हिंसा किसी एक जाति या धर्म तक सीमित नहीं है। सवर्ण परिवारों में भी दहेज और घरेलू हिंसा मौजूद है। वहीं, दलित और आदिवासी महिलाओं को जातिगत और यौन हिंसा का दोहरा बोझ झेलना पड़ता है। इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं पर परिवार के साथ-साथ समुदाय का भी भारी दबाव होता है।

शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ापन

महिलाओं की श्रम बल (Labor force) भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में काफी कम होने पर चिंता जताई गई है। सिंह का मानना है कि घर के काम, बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की चिंताएं महिलाओं को आज भी बाहरी दुनिया से दूर रखती हैं। उन्होंने माना कि उच्च शिक्षा में महिलाओं ने प्रगति जरूर की है, लेकिन संपत्ति के अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और अपने फैसले खुद लेने की आजादी के मोर्चे पर हर समुदाय की महिलाओं के सामने बड़ी चुनौतियां बरकरार हैं।

सामाजिक न्याय की कसौटी महिला सुरक्षा

हरिश्चंद्र सिंह ने कहा, देश में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव जरूर मौजूद है, लेकिन लिंग आधारित भेदभाव समाज में सबसे ज्यादा व्यापक है। पितृसत्ता किसी एक समुदाय का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह हर समाज में अलग-अलग रूपों में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की असली कसौटी यही है कि हर जाति और धर्म की महिला कितनी सुरक्षित, शिक्षित और सक्षम है। जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होगा, किसी भी समुदाय का विकास अधूरा ही रहेगा।