भारत-वियतनाम के बीच 700 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस डील पर लगेगी मुहर

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साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

भारत और वियतनाम के बीच रक्षा संबंधों में एक बड़ा अध्याय जुड़ने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के प्रधानमंत्री ली मिन हंग की मुलाकात के दौरान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को लेकर 600 से 700 मिलियन डॉलर की बड़ी डील पर अंतिम मुहर लगने की उम्मीद है। भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन कुछ कारणों से इसकी आधिकारिक घोषणा रुकी हुई थी। अब दोनों शीर्ष नेताओं की बैठक के बाद इसका औपचारिक ऐलान होने की संभावना है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का तीसरा बड़ा ग्राहक

इस सौदे के साथ ही वियतनाम भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन जाएगा। इससे पहले साल 2022 में फिलीपींस ने भारत से 375 मिलियन डॉलर में ब्रह्मोस मिसाइल और तीन बैटरियां खरीदी थीं, जिनकी डिलीवरी पूरी हो चुकी है। इसके बाद 2026 में इंडोनेशिया ने भी यह समझौता किया। क्षेत्रीय सुरक्षा को देखते हुए थाईलैंड और मलेशिया भी भारत के इस घातक हथियार को खरीदने में दिलचस्पी दिखा चुके हैं।

दक्षिण चीन सागर में बढ़ेगी वियतनाम की ताकत

वियतनाम इस मिसाइल प्रणाली का इस्तेमाल मुख्य रूप से अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत करने और समुद्री खतरों से निपटने के लिए करेगा। मिसाइल के साथ-साथ वियतनाम भारत से बैटरियां, सैन्य ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी हासिल करेगा। यह मिसाइल प्रणाली वियतनाम को एंटी-एक्सेस और एरिया-डेनियल क्षमता प्रदान करेगी, जिससे दुश्मन के जहाजों को उसके तटों तक पहुंचने से रोका जा सकेगा।

ब्रह्मोस की मारक क्षमता और खूबियां

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इसकी टॉप स्पीड 3704 किलोमीटर प्रति घंटा है और इसकी मारक क्षमता (रेंज) करीब 290 किलोमीटर है। इसे जमीन, समुद्र या हवा—तीनों प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता के कारण दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल साबित होता है।

डील के बाद की रणनीतिक चुनौतियां

समझौते की घोषणा के बाद मिसाइल सिस्टम की सुरक्षित डिलीवरी, रखरखाव और वियतनामी सेना को इसके संचालन की ट्रेनिंग देने जैसी कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने होंगी। वियतनाम भारत से एक लंबी अवधि के रक्षा सहयोग की उम्मीद कर रहा है। इसके अलावा, भविष्य में एयर-लॉन्च्ड या अपग्रेडेड रेंज वाले वर्जन की मांग भी उठ सकती है। चीन के रणनीतिक प्रभाव के चलते इस डिलीवरी और सप्लाई चेन को बनाए रखना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण टास्क होगा।