पूर्व विधायकों की पेंशन और सुविधाओं पर कोर्ट सख्त: सरकार से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायकों और विधान परिषद (MLC) के पूर्व सदस्यों को मिलने वाली आजीवन पेंशन व अन्य सुविधाओं को लेकर कानूनी शिकंजा कसता नजर आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के परिलब्धियां एवं पेंशन) अधिनियम, 1980 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को दी गई है चुनौती
यह याचिका एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ की ओर से दायर की गई है। याचिका में मई 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसमें हाईकोर्ट ने पूर्व विधायकों को मिलने वाले वित्तीय और अन्य लाभों के कानून को वैध ठहराया था। याचिकाकर्ता ने पूर्व विधायकों और उनके परिवार को मिलने वाली पेंशन, पारिवारिक पेंशन, यात्रा तथा चिकित्सा सुविधाओं की संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े किए हैं।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क
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संविधान के अनुच्छेद 195 का हवाला: याचिका में कहा गया है कि संविधान का यह अनुच्छेद राज्य विधानमंडल को सिर्फ ‘मौजूदा सदस्यों’ के वेतन और भत्ते तय करने की शक्ति देता है, न कि कार्यकाल पूरा कर चुके पूर्व सदस्यों को पेंशन देने की।
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वित्तीय लाभ मनमाने नहीं: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी उन्हें विशेष वर्ग मानकर इस तरह के आजीवन वित्तीय लाभ देना कानून की नजर में सही नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था?
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 38 और अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को पूर्व विधायकों के वेतन, भत्ते और पेंशन से जुड़े नियम बनाने का पर्याप्त अधिकार देते हैं। कोर्ट ने माना था कि पूर्व सदस्यों को अलग वर्ग मानकर लाभ देना पूरी तरह मनमाना नहीं है और इस पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
अब हाईकोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है, और अब कोर्ट के अगले निर्देश का इंतजार है।
