सिंगापुर पर आतंकी खतरा, कट्टरपंथ और सैलेड बार एक्सट्रीमिज्म पर अलर्ट

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प्रशांत मोहन गुप्ता
प्रशांत मोहन गुप्ता

मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे संघर्ष और बिगड़ते वैश्विक सुरक्षा हालात के बीच सिंगापुर के इंटरनल सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (ISD) ने गुरुवार (10 सितंबर) को देश पर मंडरा रहे आतंकी खतरे को लेकर अलर्ट जारी किया है। विभाग की वार्षिक ‘सिंगापुर टेररिज्म थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट’ के मुताबिक, सिंगापुर पर आतंकवाद का खतरा लगातार बना हुआ है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल सिंगापुर के खिलाफ किसी तुरंत होने वाले आतंकी हमले की कोई खुफिया जानकारी (specific intelligence) नहीं है। इसके बावजूद, देश और इससे जुड़े हित अभी भी आतंकी गुटों के लिए एक बेहद आकर्षक टारगेट हैं।

निशाने पर क्यों है सिंगापुर? ISD के असेसमेंट के मुताबिक, जटिल होते बाहरी खतरों के बीच चरमपंथी तत्वों की नजरों में सिंगापुर के खटकने की कुछ ठोस वजहें हैं:

  • पश्चिमी देशों से रिश्ते: अमेरिका और इजराइल जैसे पश्चिमी देशों के साथ सिंगापुर के दोस्ताना और मजबूत संबंध इसे आतंकियों के निशाने पर लाते हैं।

  • आइकॉनिक लैंडमार्क्स: देश में मौजूद दुनियाभर में मशहूर इमारतें और लैंडमार्क्स आतंकियों को ध्यान खींचने के लिए मुफीद लगते हैं।

  • बहुसांस्कृतिक समाज: सिंगापुर की धर्मनिरपेक्ष (secular) और बहुसांस्कृतिक पहचान चरमपंथी विचारधाराओं के सीधे खिलाफ खड़ी होती है।

‘सैलेड बार’ एक्सट्रीमिज्म: कट्टरपंथ का नया और खतरनाक ट्रेंड विदेशी खतरे से इतर घरेलू स्तर पर ‘सेल्फ-रेडिकलाइजेशन’ (खुद कट्टरपंथ की ओर जाना) सिंगापुर के लिए सबसे बड़ा ड्राइविंग फैक्टर बना हुआ है। लोग तेजी से अलग-अलग तरह की कट्टरपंथी विचारधाराओं (extremist ideologies) से प्रभावित हो रहे हैं।

इंटरनल सिक्योरिटी डिपार्टमेंट ने विशेष रूप से ‘कम्पोजिट वायलेंट एक्सट्रीमिज्म’ (CoVE) के उभरने का जिक्र किया है। इसे आम बोलचाल में “सैलेड बार” (salad bar) एक्सट्रीमिज्म भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति किसी एक संगठन की विचारधारा का पालन करने के बजाय अलग-अलग चरमपंथी और हिंसक विचारधाराओं का मिश्रण अपने दिमाग में तैयार कर लेता है। यह ट्रेंड खासकर खुद रेडिकलाइज होने वाले लोगों में तेजी से फैल रहा है।

कम उम्र में रेडिकलाइज हो रहे युवा युवाओं का रेडिकलाइजेशन सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी और तत्काल चिंता का विषय है। विभाग ने चेतावनी दी है कि इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (ISA) के तहत ऐसे मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। जांच में सामने आया है कि जो युवा इन चरमपंथी विचारधाराओं के जाल में फंस रहे हैं, उनकी उम्र लगातार कम होती जा रही है।