अमेरिका-ईरान युद्ध के 6 महीने, किसे फायदा-किसे नुकसान? पूरा हिसाब देखें

अमेरिका और इजरायल ने जब 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, तब यह अंदेशा जताया जा रहा था कि यह संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगा। तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और दुनिया भर में भयंकर मंदी आ जाएगी। हालांकि, इस जंग को 6 महीने बीत चुके हैं और स्थिति उम्मीद से कुछ अलग रही है। तेल, गैस और रोजमर्रा की चीजों के दाम जरूर बढ़े हैं, लेकिन कई शुरुआती अनुमान गलत भी साबित हुए हैं।
‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और होर्मुज स्ट्रेट का गतिरोध
अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित करने के लिए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ लॉन्च किया था। लेकिन छह महीने बाद भी ना तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म हुआ है और ना ही होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह सुरक्षित हो पाया है। युद्ध अब एक लंबी और महंगी लड़ाई में तब्दील हो चुका है।
अमेरिका को कितना नुकसान और टैक्सपेयर्स पर बोझ?
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सैन्य खर्च: अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के मुताबिक, युद्ध पर अब तक लगभग 38 बिलियन डॉलर (3.62 लाख करोड़ रुपए) खर्च हो चुके हैं। वहीं, डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी का दावा है कि यह खर्च 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है।
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आम नागरिकों पर असर: फ्रांस 24 की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध का खर्च हर अमेरिकी टैक्सपेयर पर करीब 1,100 डॉलर पड़ा है। मूडीज एनालिटिक्स के मुताबिक, गैसोलीन, किराने के सामान और ब्याज दरों में बढ़ोतरी से हर अमेरिकी परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ आया है।
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सैन्य क्षति: मिडिल ईस्ट में तैनात 50,000 से अधिक अमेरिकी सैनिकों में से 18 सैनिकों की जान जा चुकी है और 759 सैनिक घायल हुए हैं।
होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी और ऊर्जा संकट
दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20% हिस्सा ले जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी ने वैश्विक बाजार की कमर तोड़ दी है:
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कच्चा तेल: युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड 72 डॉलर प्रति बैरल था, जो अप्रैल में बढ़कर 126.41 डॉलर के शिखर पर पहुंच गया था। फिलहाल यह घटकर करीब 88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जो युद्ध-पूर्व स्तर से 21% ज्यादा है।
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गैसोलीन और खाद: अमेरिका में गैसोलीन की कीमतों में 37% की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, उर्वरक (फर्टिलाइजर) की आवाजाही भारी रूप से प्रभावित होने के कारण अमेरिकी किसानों को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
इस युद्ध से किसे हुआ फायदा?
राउटर्स और अन्य रिपोर्टों के मुताबिक, इस संकट के बीच कुछ क्षेत्रों को फायदा भी हुआ है:
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शेयर बाजार और टेक सेक्टर: शुरुआती गिरावट के बाद एस एंड पी 500 और नैस्डैक में रिकवरी देखी गई, जिसकी मुख्य वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता चलन है।
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क्लीन एनर्जी और ईवी (EV): फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम होने के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में सिंगापुर, न्यूजीलैंड और कोलंबिया जैसे देशों में जबरदस्त उछाल आया है।
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रक्षा ठेकेदार: पेंटागन ने लॉकहीड मार्टिन को पैट्रियट मिसाइलों के उत्पादन के लिए 58.6 बिलियन डॉलर का बड़ा अनुबंध दिया है, जिससे रक्षा आपूर्तिकर्ताओं को भारी लाभ हुआ है।
भारत पर क्या रहा असर?
इस युद्ध का सीधा असर आम भारतीय की जेब पर भी पड़ा है। देश में महंगाई लगभग 2.5% बढ़ गई है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 853 रुपए से बढ़कर 913 रुपए हो गई है, जबकि कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में भी भारी उछाल आया है। इसके अलावा सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी जरूरी खाद्य वस्तुएं भी महंगी हुई हैं।
फिलहाल यह युद्ध बिना किसी स्पष्ट अंत के जारी है, और यदि यह लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम जनता पर इसका दबाव और अधिक बढ़ सकता है।
