RLD का ‘जाट+ब्राह्मण’ दांव, 2027 से पहले जयंत की नई रणनीति

लखनऊ: राष्ट्रीय लोकदल (RLD) ने उत्तर प्रदेश में अपने पारंपरिक जनाधार का दायरा बढ़ाते हुए ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की बड़ी कवायद शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के बीच हाल के दिनों में बढ़ी तल्खी के बीच, लखनऊ में आयोजित पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन इसी रणनीति का प्रमुख केंद्र बन गया है। राजधानी में आयोजित इस सम्मेलन में करीब 1500 ब्राह्मण प्रतिनिधियों को जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। यह पहला मौका है जब जयंत चौधरी लखनऊ में इस स्तर पर इतने बड़े जातिगत समागम का नेतृत्व कर रहे हैं।
21 बटुकों का स्वस्तिवाचन और पूर्वांचल के नेताओं की मौजूदगी
सम्मेलन के दौरान जयंत चौधरी के मंच पर पहुंचने पर 21 बटुक वैदिक मंत्रोच्चार और स्वस्तिवाचन से उनका स्वागत करेंगे। राजनीतिक संदेश देने के लिए पूर्वांचल के कद्दावर नेता बीके शुक्ला की मौजूदगी को अहम माना जा रहा है। शुक्ला स्नातक क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं और वित्तविहीन विद्यालय संघ के अध्यक्ष भी हैं। उनका रालोद के साथ आना पार्टी की पूर्वांचल और मध्य यूपी में पैठ बनाने की योजना का हिस्सा है। गौरतलब है कि इससे पहले समाजवादी पार्टी भी जनेश्वर मिश्र की जयंती के जरिए ब्राह्मण समाज को साधने का प्रयास कर चुकी है।
पारंपरिक दायरे से बाहर निकलने की रणनीति
रालोद का मुख्य राजनीतिक आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं के बीच केंद्रित रहा है। अब पार्टी अपने इस पारंपरिक कोर वोटबैंक के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहती है। पार्टी रणनीतिकारों का आकलन है कि अगर पश्चिमी यूपी से निकलकर मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उपस्थिति दर्ज करानी है, तो अगड़े वर्ग विशेषकर ब्राह्मणों का समर्थन पार्टी के लिए मददगार साबित हो सकता है।
जाट, गुर्जर और ब्राह्मण: 2027 के लिए नया त्रिकोण
अखिलेश यादव द्वारा रालोद पर दिए गए ‘चवन्नी को रुपया बनाने’ वाले बयान के बाद सपा और रालोद के रिश्तों में कड़वाहट और बढ़ गई है। इसके जवाब में जयंत चौधरी लगातार अपनी स्वतंत्र सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं।
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30 अगस्त (आज): लखनऊ में ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए सवर्ण वोटरों को साधने की पहल।
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3 सितंबर: सहारनपुर में जयंत चौधरी की अगुवाई में बड़ा गुर्जर सम्मेलन आयोजित होगा।
रालोद 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जाट, गुर्जर और ब्राह्मण मतदाताओं का एक नया सामाजिक समीकरण तैयार कर रही है, ताकि केवल एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित रहने के ठप्पे से बाहर निकला जा सके।
