सोना-यूरेनियम से चाबहार तक, मोदी का उज्बेकिस्तान मिशन क्यों खास?

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ताशकंद/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौजूदा उज्बेकिस्तान दौरे ने मध्य एशिया की कूटनीति में भारत की स्थिति को रणनीतिक रूप से और मजबूत कर दिया है। राजधानी ताशकंद में पीएम मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के बीच होने वाली बातचीत केवल कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं है। सोने, यूरेनियम, तांबे और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार वाले इस देश के साथ अपनी साझेदारी बढ़ाना भारत की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

यूरेनियम और सोने के भंडार पर नजर

उज्बेकिस्तान दुनिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों की सूची में शामिल है। भारत वर्तमान में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का तेजी से विस्तार कर रहा है, जिसके लिए परमाणु ईंधन की निरंतर मांग बनी हुई है। ऊर्जा सेक्टर के जानकारों के अनुसार, उज्बेकिस्तान के साथ यूरेनियम आपूर्ति पर सहयोग भारत के लिए लंबी अवधि का रणनीतिक फायदा साबित हो सकता है।

इसके साथ ही, सोने का उत्पादन उज्बेकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है। देश की प्रमुख खदानों में बड़े पैमाने पर सोना निकाला जाता है। तांबा, चांदी, जस्ता और सीसा जैसे खनिजों से संपन्न इस देश ने भारतीय कंपनियों को अपने खनन और धातु क्षेत्र (माइनिंग और मेटल सेक्टर) में भारी निवेश के लिए आमंत्रित किया है।

प्राकृतिक गैस और ऊर्जा क्षेत्र में अवसर

खनिजों के अलावा प्राकृतिक गैस भी उज्बेकिस्तान की एक प्रमुख ताकत है, जिसका उपयोग देश में बिजली उत्पादन और औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जाता है। मध्य एशिया के ऊर्जा स्रोतों तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करना भारत की एक पुरानी रणनीतिक प्राथमिकता रही है। उज्बेकिस्तान वर्तमान में अपने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने पर जोर दे रहा है, जहां भारतीय कंपनियों के लिए बड़े अवसर मौजूद हैं।

1.3 अरब डॉलर तक पहुंचा द्विपक्षीय व्यापार

खनिज और ऊर्जा से अलग, दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और फार्मा सेक्टर में तेजी से विस्तार हो रहा है। भारत और उज्बेकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार मौजूदा समय में लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। उज्बेकिस्तान में भारतीय दवाओं की काफी अच्छी मांग है। इसके अलावा, मेडिकल उपकरण, अस्पताल निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय कंपनियों का दखल बढ़ रहा है।

चाबहार बंदरगाह से मिलेगी कनेक्टिविटी को रफ्तार

कारोबार को और अधिक बढ़ाने के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती सीधी जमीनी कनेक्टिविटी का न होना है। भारत से उज्बेकिस्तान तक सामान पहुंचाने के लिए कई देशों और लंबे परिवहन मार्गों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे व्यापार की लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं।

इस भौगोलिक बाधा से निपटने के लिए भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह पर अपना फोकस बढ़ा रहा है। इस बंदरगाह और वैकल्पिक संपर्क मार्गों के पूरी तरह से विकसित होने के बाद, भारत की मध्य एशिया तक सीधी और आसान पहुंच हो जाएगी। इससे सैन्य और व्यापारिक आवाजाही सुगम होगी, जो चीन के प्रभाव वाले इस इलाके में भारत की मौजूदगी को और मजबूत करेगी।