अमित शाह के ‘मिशन 2029’ का नीतीश कुमार ने किया विरोध, जानें वजह

nitish kumar
शैलेन्द्र कुमार झा
शैलेन्द्र कुमार झा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कोर एजेंडे में शामिल समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर से ही विरोध के सुर उठने लगे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के सभी 21 एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने का ऐलान किया है। इस योजना पर जहां शिवसेना, टीडीपी और ‘हम’ जैसी सहयोगी पार्टियां समर्थन में आ गई हैं, वहीं बिहार में सरकार चला रही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने इसका कड़ा विरोध किया है। जेडीयू नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे बिहार में इस कानून को लागू नहीं होने देंगे।

BJP की ‘स्टेट रूट रणनीति’ और राज्यों का गणित

राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के बाद बीजेपी अपने तीसरे सबसे बड़े संकल्प यूसीसी को धरातल पर उतारने के लिए तेजी से काम कर रही है। संसद में संभावित विरोध से बचने के लिए पार्टी ने ‘स्टेट रूट रणनीति’ अपनाई है। इसके तहत पूरे देश में एक साथ कानून लाने के बजाय इसे उन राज्यों में लागू किया जा रहा है जहां एनडीए या बीजेपी समर्थित सरकारें हैं।

उत्तराखंड में यूसीसी लागू हो चुका है और अब गुजरात, असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसे लाने की तैयारी है। यूपी, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे पूर्ण बहुमत वाले राज्यों में बीजेपी के लिए राह आसान है, लेकिन बिहार जैसे सहयोगी निर्भर राज्यों में नीतीश कुमार का विरोध इस योजना के सामने बड़ी दीवार बन गया है।

UCC पर बंटा NDA, टीडीपी और शिवसेना का समर्थन

अमित शाह के ऐलान के बाद एनडीए के भीतर यूसीसी पर दो अलग-अलग धड़े बन गए हैं। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने एक देश-एक कानून का खुलकर स्वागत किया है और इसे बाल ठाकरे का पुराना सपना बताया है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी (TDP) ने भी इस मुद्दे पर व्यावहारिक रुख अपनाया है। टीडीपी का कहना है कि अगर अल्पसंख्यकों के बुनियादी अधिकारों का हनन नहीं होता है, तो वे प्रगति और लैंगिक समानता के लिए यूसीसी के साथ हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की ‘हम’ ने भी इस पहल का समर्थन किया है। इन सबके बीच सिर्फ जेडीयू ही ऐसी बड़ी सहयोगी पार्टी है जिसने खुलकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

नीतीश कुमार के विरोध की सियासी वजह

जेडीयू के इस कड़े स्टैंड के पीछे बिहार का चुनावी गणित है। राज्य में करीब 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालती है। नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक सफर में खुद को सिर्फ कुर्मी-कोयरी (लव-कुश) और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्होंने ‘पसमांदा मुसलमानों’ का एक वफादार वोट बैंक भी तैयार किया है।

पार्टी को आशंका है कि यूसीसी का खुला समर्थन करने से यह अल्पसंख्यक वोट बैंक पूरी तरह से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) या अन्य विपक्षी दलों की तरफ खिसक सकता है। अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष’ (Secular) छवि को बरकरार रखने के लिए जेडीयू यह संदेश देना चाहती है कि वह बीजेपी के साथ सरकार में होने के बावजूद अपनी स्वतंत्र विचारधारा से समझौता नहीं करेगी।

पुराने फैसलों का ट्रैक रिकॉर्ड

जेडीयू के वर्तमान विरोध का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। इससे पहले नागरिकता संशोधन कानून (CAA), तीन तलाक बिल और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसे अति संवेदनशील मुद्दों पर भी जेडीयू ने शुरुआत में विरोध दर्ज कराया था। हालांकि, संसद में वोटिंग के दौरान नीतीश कुमार की पार्टी ने बीजेपी के पक्ष में ही मतदान किया था। हाल ही में लाए गए वक्फ संशोधन विधेयक के समय भी जेडीयू ने केंद्र सरकार के फैसले का ही समर्थन किया था।