विज्ञापनों में हिंदू त्योहारों पर विवाद और आउटरेज मार्केटिंग का खेल

ज्वेलरी ब्रांड जीवा (GIVA) द्वारा बॉलीवुड एक्ट्रेस कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन को वापस लिए जाने की घटना ने एक बार फिर कॉर्पोरेट विज्ञापनों और त्योहारों के बदलते स्वरूप पर बहस छेड़ दी है। पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां बड़े ब्रांड्स हिंदू त्योहारों पर विज्ञापन बनाते हैं, सोशल मीडिया पर विवाद होता है और फिर माफ़ीनामे के साथ विज्ञापन हटा लिया जाता है। इस बार-बार दोहराए जाने वाले पैटर्न ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं को विज्ञापन एजेंसियां जानबूझकर निशाना बना रही हैं।
इस पूरे विवाद को केवल धर्म के नज़रिए से देखने के बजाय आज के बाज़ारवाद (Commercialization) की क्रूर सच्चाई के संदर्भ में भी समझना जरूरी है।
प्रगतिशील दिखने की अंधी दौड़
आजकल कॉर्पोरेट और एड एजेंसियां खुद को सबसे अलग और ‘आधुनिक’ दिखाने की होड़ में लगी हैं। रक्षाबंधन मूल रूप से भाई-बहन के अटूट प्रेम और सुरक्षा के संकल्प का एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्व है। ब्रांड्स ने इस पवित्र त्योहार के मूल भाव को बदलकर उसे एक पश्चिमी ‘लाइफस्टाइल इवेंट’ की तरह पेश करना शुरू कर दिया है।
विज्ञापन में पालतू जानवरों को राखी बांधना या पहनावे और प्रस्तुतीकरण में त्योहार की गरिमा का ध्यान न रखना, खुद को प्रगतिशील साबित करने की इसी अंधी दौड़ का नतीजा माना जा रहा है, जिससे बड़े वर्ग की भावनाएं आहत होती हैं।
‘आउटरेज मार्केटिंग’ (Outrage Marketing) का ट्रेंड
मार्केटिंग की दुनिया में अब यह थ्योरी तेजी से पुख्ता हो रही है कि ऐसे विज्ञापन सिर्फ अज्ञानता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। इसे बाज़ार की भाषा में ‘आउटरेज मार्केटिंग’ कहा जाता है।
ब्रांड्स यह अच्छी तरह जानते हैं कि विवादित कंटेंट से उन्हें सोशल मीडिया पर जबरदस्त और मुफ्त पब्लिसिटी (Negative PR) मिलेगी। नकारात्मक चर्चा के जरिए ब्रांड का नाम कुछ ही घंटों में उन करोड़ों लोगों की टाइमलाइन तक पहुंच जाता है, जो शायद पहले उस ब्रांड को जानते भी नहीं थे। विवाद जब चरम पर पहुंचता है, तो कंपनी एक साधारण सा माफ़ीनामा जारी कर विज्ञापन वापस ले लेती है। लेकिन तब तक मार्केटिंग का मुख्य उद्देश्य—’ब्रांड अवेयरनेस’—पूरा हो चुका होता है।
‘क्रिएटिव लिबर्टी’ और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का अभाव
विवादित विज्ञापनों के पीछे एक बड़ा कारण एड एजेंसियों का आम जनजीवन और जमीनी हकीकत से कटा होना भी है। इन कॉर्पोरेट कमरों में बैठे क्रिएटिव डायरेक्टर्स के लिए होली, दिवाली या रक्षाबंधन अक्सर सिर्फ अपना प्रोडक्ट बेचने का एक ‘सीजन’ या अवसर होता है।
‘क्रिएटिव लिबर्टी’ (रचनात्मक छूट) के नाम पर अक्सर यह नजरअंदाज कर दिया जाता है कि इन त्योहारों से करोड़ों लोगों की गहरी आस्थाएं जुड़ी हैं। जब तक ब्रांड्स के अंदर निर्णय लेने वाले पदों पर विविधता और जमीनी संस्कृति को समझने वाले लोग नहीं होंगे, ऐसे ‘टोन-डेफ’ (Tone-deaf) विज्ञापन बनते रहने की आशंका बनी रहेगी।
सोशल मीडिया का विरोध बनाम आर्थिक जुर्माना
हिंदू त्योहारों को लेकर सहिष्णुता की उम्मीद ज्यादा होने के कारण वे अक्सर इस ‘क्रिएटिव एक्सपेरिमेंट’ का आसान शिकार बनते हैं। हालांकि, अब सोशल मीडिया के जरिए उपभोक्ता तेजी से ब्रांड्स की जवाबदेही तय कर रहे हैं। लगातार हो रहे विरोध के चलते आस्था के व्यावसायीकरण को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। पब्लिक डोमेन में अब इस बात पर चर्चा तेज है कि क्या ऐसे मामलों में ब्रांड्स को सिर्फ सोशल मीडिया के विरोध और माफीनामे पर छोड़ देना चाहिए, या फिर उन पर भारी आर्थिक जुर्माना जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
