100 चैनलों पर नजर, नई तकनीक क्वांटम कम्युनिकेशन की रफ्तार बढ़ाएगी?

चीनी वैज्ञानिकों ने क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों की एक टीम ने 100-चैनल वाला ‘सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर’ (Single-photon detector) विकसित किया है। यह नई तकनीक ब्रॉडबैंड क्वांटम नेटवर्क के भविष्य के लिए एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
अब तक उपलब्ध अत्याधुनिक सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर, जो फोटोनिक क्वांटम तकनीक के लिए बेहद जरूरी हैं, अधिकतम 32 डिटेक्शन चैनलों को ही सपोर्ट कर सकते थे। लेकिन शंघाई स्थित एक टीम द्वारा विकसित नई इंटरकनेक्ट योजना (interconnect scheme) ने इस सीमा को तोड़ दिया है।
‘बड़े पैमाने पर क्वांटम एप्लिकेशन का रास्ता साफ’
चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के तहत आने वाले ‘शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोसिस्टम एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी’ (SIMIT) के शोधकर्ताओं ने यह कारनामा किया है। यह शोध पत्र सितंबर के अंत में पीयर-रिव्यू जर्नल लेजर एंड फोटोनिक्स रिव्यूज (Laser & Photonics Reviews) में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने अपने पेपर में लिखा है, “यह काम एक मजबूत और स्केलेबल बुनियादी ढांचा स्थापित करता है, जिससे बड़े पैमाने पर क्वांटम फोटोनिक एप्लिकेशन का मार्ग प्रशस्त होता है।”
क्या है सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर और कैसे करता है काम?
सुपरकंडक्टिंग नैनोवायर सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर (SNSPD) एक हाई-एंड ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है। यह सुपरकंडक्टिंग सामग्री की चरम संवेदनशीलता का उपयोग कर व्यक्तिगत फोटॉन का पता लगाता है। यह तकनीक लगभग 100 प्रतिशत डिटेक्शन क्षमता के साथ सबसे उन्नत मानी जाती है। अपनी तेज प्रतिक्रिया, उच्च समय रिज़ॉल्यूशन (time resolution) और सटीक डिटेक्शन क्षमता के कारण इसका इस्तेमाल क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार और लीडार (lidar) में किया जाता है।
32 चैनल से आगे बढ़ने में क्या थी बाधा?
इस सिस्टम को बड़े पैमाने पर लागू करने में ‘तापमान’ सबसे बड़ी चुनौती रही है। इन डिटेक्टरों को चलाने के लिए एक अल्ट्रा-थिन सुपरकंडक्टिंग नैनोवायर फिल्म को परम शून्य (absolute zero) के करीब क्रायोजेनिक वातावरण में ठंडा करना पड़ता है। फिर इसे एक केबल के जरिए रूम-टेम्प्रेचर वाले वातावरण से जोड़ा जाता है, ताकि सिग्नल बाहर भेजे जा सकें।
पारंपरिक रूप से इसमें कोएक्सियल (Coaxial) केबल का उपयोग होता है, जो धातु से बने होते हैं और ऊष्मा के सुचालक होते हैं। रूम टेम्प्रेचर से गर्मी लगातार इन केबलों के माध्यम से क्रायोजेनिक चैंबर में जाती रहती है, जिसे ‘थर्मल लोड’ कहा जाता है। जब चैनलों की संख्या बढ़ती है, तो केबलों के भारी बंडल से थर्मल लोड बहुत बढ़ जाता है, जिससे सिस्टम का आकार और कूलिंग पावर की खपत बढ़ जाती है। यही कारण था कि पुराने सिस्टम केवल 32 चैनलों तक सीमित थे।
शंघाई टीम ने कैसे सुलझाई समस्या?
इस समस्या से निपटने के लिए शंघाई टीम ने सिस्टम का एक नया डिजाइन तैयार किया। उन्होंने अल्ट्रा-थिन (अत्यंत पतले) और विशेष लचीली सामग्री से बने ‘हाई-डेंसिटी मल्टी-कोर माइक्रोस्ट्रिप लाइन्स’ (high-density multi-core microstrip lines) विकसित कीं। यह नई सामग्री थर्मल रूप से अत्यधिक इंसुलेटिंग (तापरोधी) है। टीम के अनुसार, इस नए सिस्टम में पारंपरिक मोटी केबल से पैदा होने वाली गर्मी का सिर्फ 21वां हिस्सा ही लीक होता है।
7 दिन तक 2.1K के तापमान पर सफल परीक्षण
लगातार 7 दिनों तक 24 घंटे किए गए परीक्षण के दौरान, क्रायोजेनिक प्लेटफॉर्म का तापमान स्थिर रूप से 2.1K से नीचे बना रहा। यह तापमान ‘परम शून्य’ (0K, या -273.15 डिग्री सेल्सियस) की भौतिक सीमा के बेहद करीब है। परीक्षण के नतीजों से पता चला कि सभी चैनलों ने 80 प्रतिशत से अधिक की सिस्टम डिटेक्शन क्षमता हासिल की।
इस प्लेटफॉर्म की क्षमता को वास्तविक दुनिया के परिदृश्यों में साबित करने के लिए, शोधकर्ताओं की टीम ने पांच उपयोगकर्ताओं का एक पूर्ण क्वांटम एंटैंगलमेंट डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क (quantum entanglement distribution network) भी तैयार किया।

