घुटन से मरने के बजाय आत्मसम्मान के साथ…, विश्वेंद्र ने कांग्रेस क्यों छोड़ी?

राजस्थान में नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों के बाद प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस (Congress) में भारी सियासी भूचाल आ गया है। पार्टी के दिग्गज जाट नेता, भरतपुर राजघराने के पूर्व राजकुमार और अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे विश्वेंद्र सिंह (Vishvendra Singh) ने कांग्रेस छोड़ दी है।
निकाय चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन, संगठन की नाकामी और टिकट वितरण में कथित धांधली को लेकर विश्वेंद्र सिंह ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, “घुटन से मरने के बजाय, आत्म-सम्मान के साथ मरना बेहतर है।”

‘अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया फैसला’
भरतपुर के शाही परिवार से आने वाले पूर्व मंत्री ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी है। विश्वेंद्र सिंह ने लिखा: “मैंने अपनी जिंदगी में हमेशा अपने पूज्य गिरिराज महाराज और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर फैसले लिए हैं। छोटी सोच वाले और तथाकथित नेताओं के बयानों से मुझे और मेरे समर्थकों को दुख पहुंचा है। अगर सच बोलना और गलत बातों का समर्थन न करना गुनाह है, तो मैं हर बार यह गुनाह करूंगा। मैं न तो गलत करता हूं और न ही गलत बर्दाश्त करता हूं।”
हालांकि, अभी तक कांग्रेस संगठन की ओर से इस बात की पुष्टि नहीं की गई है कि उन्होंने औपचारिक तौर पर अपना इस्तीफा सौंपा है या नहीं।
निकाय चुनाव में हार और डोटासरा पर तीखा हमला
विश्वेंद्र सिंह ने निकाय चुनावों में कांग्रेस की हार के लिए सीधे तौर पर पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा की संगठनात्मक क्षमता पर सवाल उठाए। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पूरे राजस्थान में रोड शो किए, लेकिन राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसा क्यों नहीं किया?”
उन्होंने पाली और अलवर का उदाहरण देते हुए पार्टी की नाकामी गिनाई:
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पाली का गणित: 65 सदस्यीय बोर्ड में कांग्रेस के पास 29 पार्षदों का समर्थन था, जबकि भाजपा के पास 21 पार्षद थे। इसके बावजूद क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार को सिर्फ 3 वोट मिले और भाजपा बाजी मार ले गई।
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अलवर का हाल: यहां भाजपा के पास 28 और कांग्रेस के पास 23 पार्षद थे, लेकिन 13 निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल कर भाजपा आसानी से बोर्ड बनाने में सफल रही।
डीग-भरतपुर में टिकट बंटवारे पर मचा बवाल
विश्वेंद्र सिंह के गृह क्षेत्र भरतपुर और डीग में टिकट वितरण को लेकर विवाद इस इस्तीफे की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।
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अपनों की अनदेखी का आरोप: सिंह ने आरोप लगाया कि डीग और भरतपुर के जिला अध्यक्षों ने डोटासरा के संरक्षण में निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अपने चहेतों को टिकट बांटे।
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डीग में कांग्रेस का सूपड़ा साफ: डीग, जहां से विश्वेंद्र सिंह विधायक रहे हैं, वहां कांग्रेस एक भी पार्षद सीट नहीं जीत सकी (भाजपा-16, निर्दलीय-24)।
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अपमान का दावा: हार के बाद पार्टी ने उन्हीं जिला अध्यक्षों से विश्वेंद्र सिंह के खिलाफ रिपोर्ट तैयार करने को कहा, जिसे सिंह खेमे ने अपना भारी अपमान माना। इसी के चलते उन्होंने डोटासरा के इस्तीफे की भी मांग की थी।
कांग्रेस के लिए कितना बड़ा है यह झटका?
विश्वेंद्र सिंह का कांग्रेस छोड़ना पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका है, खासकर तब जब राजस्थान में पंचायत चुनाव की तैयारियां चल रही हैं।
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जाट समुदाय में पकड़: तीन बार सांसद, तीन बार विधायक और दो बार मंत्री रह चुके विश्वेंद्र सिंह पूर्वी राजस्थान (भरतपुर, धौलपुर, करौली) के जाट समुदाय का एक बेहद मजबूत और प्रभावशाली चेहरा हैं।
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राजघराने का प्रभाव: भरतपुर राजघराने से होने के कारण उनकी सामाजिक पकड़ बहुत गहरी है।
सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफे के ऐलान के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल के लिए विश्वेंद्र सिंह से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि विश्वेंद्र सिंह का अगला सियासी कदम क्या होता है—क्या वे भाजपा में वापसी करेंगे या कोई नया राजनीतिक मंच चुनेंगे?

