जात न पूछो साधु की से बहुत दूर है राजनीति, यहां जात ही पहला सवाल है

दो हजार चार से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश के लगभग हर चुनाव को नजदीक से कवर किया है। लोकसभा हो या विधानसभा, उपचुनाव हो या नगर निकाय—मैदान में घूमते हुए एक सच्चाई बार-बार साफ होती गई है। यहां ‘जात न देखो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’ वाली उक्ति राजनीति में काम नहीं आती। यहां साधु हो या नेता, ज्ञान हो या विकास का वादा—सबसे पहले और सबसे आखिर में जात ही देखी जाती है।
यह कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों, टिकट वितरण, गठबंधनों और वोटिंग पैटर्न से बार-बार साबित हुई हकीकत है।
जाति का इतिहास और राजनीति का गठजोड़
उत्तर प्रदेश में जाति हमेशा से सामाजिक संरचना का आधार रही है, लेकिन राजनीति में इसका संगठित इस्तेमाल 1990 के बाद तेज हुआ। मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़ी जातियों को राजनीतिक ताकत दी। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने यादव और मुस्लिम समीकरण को अपना मुख्य आधार बनाया। बसपा ने दलितों, खासकर जाटवों को संगठित किया। भाजपा ने ऊंची जातियों के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को जोड़ने की रणनीति अपनाई।
2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बसपा ने ‘सर्वजन’ का नारा दिया था। ब्राह्मण-दलित समीकरण ने काम किया और पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव की सपा ने वापसी की। फिर 2017 और 2022 में भाजपा ने जिस तरह से जीत हासिल की, उसमें जातिगत समीकरण की निर्णायक भूमिका थी। 2022 में सपा ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दिया, लेकिन भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों को अपने पक्ष में बनाए रखा।
टिकट से लेकर मंत्रिमंडल तक
चुनावी मैदान में टिकट वितरण सबसे बड़ा सबूत है। किसी भी पार्टी में टिकट देते समय सबसे पहले जातीय समीकरण देखा जाता है। उम्मीदवार की छवि, काम और साफ छवि बाद में आते हैं। विधानसभा क्षेत्रों में जातीय जनसंख्या के हिसाब से उम्मीदवार चुने जाते हैं। मंत्रिमंडल बनाने में भी यही गणित चलता है। प्रतिनिधित्व का मतलब ज्यादातर जातियों का प्रतिनिधित्व हो जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी यही दिखा। सपा ने ज्यादातर सीटों पर यादव, मुस्लिम या अन्य पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार उतारे। भाजपा ने ऊंची जातियों के साथ कुर्मी, निषाद, राजभर जैसी जातियों को जगह दी। नतीजे चाहे जो रहे हों, प्रक्रिया जाति केंद्रित ही रही।
विकास और व्यक्तित्व भी जाति के आगे कमजोर
कई बार कहा जाता है कि विकास और सुशासन जाति को पीछे छोड़ देते हैं। 2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा ने कानून-व्यवस्था और विकास का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि भी मजबूत रही। फिर भी पार्टी ने जातीय समीकरणों को कभी नजरअंदाज नहीं किया। गैर-यादव ओबीसी को संगठन और सरकार में जगह देना जारी रखा।
इसी तरह अखिलेश यादव की युवा छवि और कुछ विकास कार्य 2012 में काम आए, लेकिन उनके बाद के चुनावों में पार्टी को फिर से अपने कोर वोट बैंक पर निर्भर होना पड़ा। बसपा का दलित वोट बैंक भी जाटव और गैर-जाटव में बंटता दिखा।
क्यों नहीं चलता ‘साधु’ वाला सूत्र?
उत्तर प्रदेश में सामाजिक असुरक्षा, संसाधनों पर नियंत्रण और पहचान की राजनीति इतनी गहरी है कि मतदाता अक्सर अपने समुदाय के हित को प्राथमिकता देता है। शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी जातीय नजरिए से देखे जाते हैं। नेता भी जानते हैं कि शुद्ध वैचारिक या व्यक्तित्व आधारित राजनीति यहां अभी सीमित असर रखती है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भी वही तस्वीर दिख रही है। पार्टियां फिर से जातीय समीकरण साधने में जुटी हैं। धार्मिक आयोजन हों या विकास का दावा—अंत में गणना जाति की ही हो रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति कोई अस्थायी कारक नहीं, बल्कि स्थायी संरचना है। यह बदलती जरूर है—पुरानी समीकरण टूटते हैं, नए बनते हैं—लेकिन गायब नहीं होती। ‘जात न देखो साधु की’ वाली बात यहां आध्यात्मिक प्रवचन में ठीक लग सकती है, लेकिन चुनावी मैदान में यह व्यावहारिक नहीं। यहां मतदाता भी और नेता भी सबसे पहले जात देखते हैं। बाकी सब उसके बाद आता है।
यह हकीकत जितनी पुरानी है, उतनी ही वर्तमान भी। 2004 से लेकर 2026 तक के अनुभव यही कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए सबसे पहले जाति की भाषा समझनी होती है। बिना इसके न नतीजे समझ आते हैं और न भविष्य के संकेत।

