नौकरी नियम पर भड़का विपक्ष, सपा-कांग्रेस ने बताया अंग्रेजों जैसा कानून

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए चरित्र सत्यापन (Character Verification) के नियम सख्त किए जाने पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। हिंसक प्रदर्शनों या व्यवस्था बदलने वाले संगठनों में शामिल युवाओं को नौकरी के लिए अयोग्य ठहराने के राज्य सरकार के फैसले का कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (SP) ने कड़ा विरोध किया है। विपक्ष ने इस नए आदेश को ‘ब्रिटिश राज’ की याद दिलाने वाला और युवाओं की आवाज कुचलने की कोशिश करार दिया है।

‘अंग्रेजों जैसा कानून, सरकार डरा रही है’- सपा

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने सरकार के इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर का कानून बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आदेश तब जारी किए जाते थे जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। उदयवीर ने स्पष्ट किया, “स्वतंत्र भारत में विरोध करने का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है। सत्ता में बदलाव एक स्थापित कानूनी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए होता है। मौजूदा सरकार डराने-धमकाने वाली मानसिकता के साथ काम कर रही है।”

चुनाव हारने के डर से युवाओं को देशद्रोही ठहरा रही BJP: कांग्रेस

कांग्रेस ने भी इस नियम को लेकर सरकार पर तीखा प्रहार किया है। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनाव में हार के डर से देश के युवाओं और ‘जेन-जी’ (Gen-Z) को देशद्रोही ठहराने पर तुली है।

राजपूत ने कहा, “सरकार कह रही है कि अगर आपने किसी भी आंदोलन में भाग लिया तो आपको हिंसा के नाम पर जेल में बंद कर देंगे और नौकरी से बेदखल कर देंगे। अंग्रेज हम लोगों को नहीं डरा सके तो आप लोग क्या डरा सकेंगे?” उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार जितनी भी कोशिश कर ले, लोकतांत्रिक आंदोलन बंद नहीं होंगे।

क्या है नया नियम और किस पर होगा लागू?

नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी आदेश के अनुसार, राज्य के सभी विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों की सीधी भर्ती में यह सख्ती लागू होगी। आदेश में लिखा गया है कि जो लोग हिंसात्मक रूप से मौजूदा व्यवस्था को बदलने की कोशिश करने वाले संगठनों से जुड़े हैं, उन्हें सरकारी नौकरी के योग्य नहीं माना जाएगा।

नए नियम में एक अहम क्लॉज यह भी है कि 21 साल की आयु के बाद और जांच की तारीख से तीन साल के भीतर यदि अभ्यर्थी ऐसी किसी हिंसक गतिविधि में शामिल पाया जाता है, तो उसे इसमें ‘सक्रिय’ माना जाएगा। इससे तभी राहत मिलेगी जब समय के इस अंतराल में उसकी प्रवृत्ति में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण मौजूद हों।

सिर्फ FIR होने से नहीं छिनेगी नौकरी, पुलिस रिपोर्ट होगी अहम

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल एफआईआर (FIR) दर्ज होने या किसी मामले की जांच लंबित रहने मात्र से कोई अभ्यर्थी स्वतः अयोग्य घोषित नहीं हो जाएगा। ऐसे मामलों में पुलिस को 30 दिन के भीतर अपनी सत्यापन रिपोर्ट देनी होगी।

कुल मिलाकर, हिंसक प्रदर्शनों में शामिल होने वाले युवाओं का भविष्य अब पुलिस की जांच और उसके द्वारा जारी कैरेक्टर सर्टिफिकेट पर निर्भर करेगा। हालांकि, यह नियम पहले से सरकारी नौकरी कर रहे कर्मचारियों के दोबारा सत्यापन पर लागू नहीं होगा।