कांग्रेस की बड़ी मांग, अखिलेश की अपनी रणनीति… यूपी में क्या पक रहा है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी गठबंधन की बातें हमेशा दोहरे अर्थ रखती हैं। मंचों से जहां साझा लक्ष्य और एकजुटता का संदेश दिया जाता है, वहीं बंद कमरों में सीटों की संख्या और प्रभाव क्षेत्र को लेकर तीखी रस्साकशी चलती है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्य विपक्षी खेमे में एक बार फिर यही कहानी दोहराई जा रही है।
कांग्रेस ने प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों को A, B और C कैटेगरी में बांटकर करीब 150 सीटों को अपनी प्राथमिकता सूची में रखा है। पार्टी का स्पष्ट रुख है कि औपचारिक वार्ता में वह कम से कम 100 सीटों से नीचे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगी। अक्टूबर से समाजवादी पार्टी (SP) के साथ सीट बंटवारे पर औपचारिक चर्चा शुरू होने जा रही है, लेकिन अंतिम फैसला राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच सीधी बातचीत के बाद ही होगा। तब तक दोनों दलों की ओर से दबाव की राजनीति अपने चरम पर दिख रही है।
संगठन सृजन और नए सामाजिक समीकरणों की बिसात
उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास को देखें तो ऐसे गठबंधन हमेशा आंकड़ों से शुरू होते हैं और आपसी विश्वास की कसौटी पर परखे जाते हैं। कांग्रेस इस बार टेबल टॉक में केवल प्रतीकात्मक मांग रखने के बजाय अपनी संगठनात्मक तैयारी का मजबूत हवाला दे रही है। पार्टी हर जिले में ‘संगठन सृजन’ अभियान चला रही है। कांग्रेस का तर्क है कि जब तक उसकी जमीनी उपस्थिति मजबूत नहीं होगी, तब तक वह सपा के लिए भी एक प्रभावी सहयोगी साबित नहीं हो सकेगी।
पार्टी का मुख्य जोर दलित, ब्राह्मण और अति-पिछड़ा (EBC) मतदाताओं में अपनी पारंपरिक पकड़ को दोबारा हासिल करने पर है। वहीं मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के जरिए प्रमुख मुस्लिम चेहरों को पार्टी में शामिल करने का सिलसिला तेज कर दिया गया है।
2019 बनाम 2024: आंकड़ों के जरिए ताकत का अहसास
कांग्रेस नेतृत्व सीट बंटवारे के लिए 2024 के लोकसभा नतीजों को मुख्य आधार बना रहा है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा ने बसपा और रालोद के साथ मजबूत गठबंधन किया था, तब उसे महज 5 सीटें मिली थीं और अकेले लड़ी कांग्रेस को एक सीट हासिल हुई थी।
इसके उलट, 2024 में जब सपा और कांग्रेस ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक के तहत साथ आए, तो सपा ने रिकॉर्ड 37 सीटें जीतीं और कांग्रेस के खाते में 6 सीटें आईं। कांग्रेस इस तुलना के जरिए यह स्थापित करना चाहती है कि उसकी मौजूदगी ने सपा के प्रदर्शन को नई ताकत दी। लिहाजा, पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में खुद को एक ‘जूनियर पार्टनर’ के रूप में सीमित नहीं रखना चाहती।
रथ यात्राओं के जरिए सियासी संदेश
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के पास मौजूदा विधानसभा में मजबूत संख्या बल और कैडर का आधार है। बड़ी पार्टियां अमूमन अपने छोटे सहयोगियों को सीमित दायरे में रखने की रणनीति अपनाती हैं। यही कारण है कि अखिलेश यादव ने कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ रायबरेली से अपनी रथ यात्रा का आगाज कर अपने जनाधार की याद दिलाई। इसके जवाब में कांग्रेस नेताओं ने सपा के गढ़ इटावा और मैनपुरी से अपनी यात्रा निकालने की बात कही।
सीटों की औपचारिक बातचीत से ठीक पहले शक्ति प्रदर्शन और तीखी बयानबाजी का यह दौर दबाव बनाने की उसी रणनीति का हिस्सा है, जो हर बड़े गठबंधन से पहले देखी जाती रही है।
A, B और C कैटेगरी के जरिए सौदेबाजी का दायरा
कांग्रेस द्वारा सीटों को तीन श्रेणियों में बांटना एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है:
-
‘A’ श्रेणी: वे मजबूत सीटें जहां पार्टी के पास सक्रिय संगठन और मजबूत उम्मीदवार उपलब्ध हैं।
-
‘B’ और ‘C’ श्रेणी: वे सीटें जिन्हें विकल्प के तौर पर या समझौते के दौरान लचीलापन दिखाने के लिए रखा गया है।
150 सीटों की शुरुआती मांग के साथ 100 से कम पर न झुकने का अडिग रुख यह दर्शाता है कि कांग्रेस केवल एक सहायक दल की भूमिका में नहीं रहना चाहती। पार्टी के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र गौतम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पार्टी का अंतिम लक्ष्य ‘दिल्ली की कुर्सी’ है, और उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों और वोट शेयर में मजबूती ही 2029 के लोकसभा चुनाव में उसकी राष्ट्रीय सौदेबाजी क्षमता को बढ़ाएगी।
असली खेल अक्टूबर के बाद
आगामी कुछ हफ्ते उत्तर प्रदेश के सियासी भविष्य के लिए बेहद अहम होने जा रहे हैं। जब दोनों दल बातचीत की मेज पर आमने-सामने बैठेंगे, तो जमीनी हकीकत, आंकड़े और सीटों के समीकरणों पर गहन मंथन होगा। दोनों पार्टियां भली-भांति जानती हैं कि अलग-अलग चुनाव लड़ने पर दोनों को ही भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 2024 ने दोनों को एक-दूसरे की जरूरत का अहसास कराया है, लेकिन सवाल यह है कि यह जरूरत सत्ता की भागीदारी में कितनी बराबरी हासिल कर पाती है।
शतरंज की यह बिसात अभी सज रही है और मोहरे चल दिए गए हैं, लेकिन इस दबाव की राजनीति का अंतिम समाधान राहुल गांधी और अखिलेश यादव की टेबल पर ही तय होगा।

