अब अपने असली आकार में दिखेंगे भारत और अफ्रीका, जानें क्या होगा असर

दुनिया का नक्शा करीब 450 साल बाद बदलने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर 1569 से चले आ रहे ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ (Mercator projection) वाले विश्व मानचित्र को बदलने की मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 164 और विरोध में केवल 1 वोट पड़ा। इस बड़े बदलाव के बाद अब भारत, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे देश नक्शे पर अपने वास्तविक और सटीक आकार में दिखाई देंगे।
मर्केटर प्रोजेक्शन में क्या थी खामी?
साल 1569 में तैयार किया गया मर्केटर मानचित्र मूल रूप से समुद्री नेविगेशन के लिए बनाया गया था। इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि भूमध्य रेखा (Equator) से दूर स्थित देश इसमें वास्तविक आकार से बहुत बड़े दिखाई देते हैं। वहीं, भूमध्य रेखा के आसपास स्थित देशों का आकार अपेक्षाकृत छोटा नजर आता है।
इस विसंगति का सबसे बड़ा उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका है। प्रचलित मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखता है, जबकि हकीकत में अफ्रीका उससे 14 गुना विशाल है। इसी तरह यूरोप, रूस और कनाडा जैसे उत्तरी इलाके नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़े नजर आते हैं, जबकि भारत और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्से अपने वास्तविक क्षेत्रफल के मुकाबले काफी छोटे दिखते हैं।
UNGA का नया प्रस्ताव: ‘ईक्वल अर्थ’ मैप को मिलेगी तरजीह
UNGA के नए प्रस्ताव में ‘ईक्वल अर्थ’ (Equal Earth) और अन्य ‘ईक्वल-एरिया’ (Equal-area) मानचित्रों के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात में दिखाना है। UNGA का यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है, लेकिन आधिकारिक, शैक्षणिक और सांख्यिकीय उपयोग में अब उन मानचित्रों को तरजीह दी जाएगी जो दुनिया की अधिक संतुलित और वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं।
भारत और ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए नजरिए का बदलाव
इस फैसले से जमीन पर किसी देश की सीमाएं या क्षेत्रफल नहीं बदल रहे हैं, लेकिन कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक नजरिए से यह बदलाव बेहद अहम है। दशकों से आधिकारिक नक्शों में यूरोप और उत्तरी गोलार्ध के देश विशालकाय नजर आते थे, जिससे दुनिया के देशों के प्रभाव और आकार को लेकर एक खास धारणा बनती थी। नए मानचित्रों में भारत सहित ‘ग्लोबल साउथ’ की भौगोलिक मौजूदगी वास्तविकता के करीब दिखेगी।
स्कूली किताबों और Google Maps पर क्या होगा असर?
इस फैसले का सबसे गहरा प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा। भविष्य की किताबों और एटलस में महाद्वीपों की सटीक तस्वीर छपेगी। दुनिया भर के छात्र यह स्पष्ट रूप से समझ पाएंगे कि अफ्रीका वास्तव में कितना विशाल है और भारत दुनिया के नक्शे में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
जहां तक Google Maps और Apple Maps जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का सवाल है, वहां नेविगेशन के लिए वेब मर्केटर आधारित सिस्टम का उपयोग जारी रह सकता है, क्योंकि उससे रास्ते, दिशा और दूरी दिखाना तकनीकी रूप से आसान होता है। रोजमर्रा की दिशा बताने वाली मैप सेवाएं भले ही तुरंत न बदलें, लेकिन वैश्विक स्तर पर दुनिया को देखने और प्रस्तुत करने का आधिकारिक तरीका अब हमेशा के लिए बदल गया है।
