जंगल, वन देवी और रहस्य… The Vvaan में कितना दम? पढ़ें फिल्म का रिव्यू

बॉलीवुड में इन दिनों लोककथाओं और हॉरर-कॉमेडी का फॉर्मूला सुपरहिट साबित हो रहा है। ‘स्त्री’, ‘मुंज्या’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों की सफलता के बाद निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा बिहार की एक वन देवी की दंतकथा पर आधारित फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ (The Van: Force of the Forest) लेकर आए हैं। ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी सीरीज बनाने वाले दीपक मिश्रा और अरुणाभ कुमार ने एकता कपूर के साथ मिलकर इस फिल्म का निर्माण किया है। आइए जानते हैं, क्या सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर यह फिल्म दर्शकों को डराने और हंसाने में कामयाब रही है?
‘द वन’ मूवी की कहानी
फिल्म की कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और ममता (तमन्ना भाटिया) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो मुंबई में रहते हैं और लंबे समय से पैरेंट्स बनने की कोशिश कर रहे हैं। छठ पूजा के मौके पर दोनों अपने पुश्तैनी गांव जाते हैं, जहां ऋषि के भैया-भाभी (अनूप सोनी और श्वेता तिवारी) अपने बच्चों के साथ रहते हैं। गांव पहुंचकर ऋषि को पता चलता है कि वहां के लोग आज भी सदियों पुरानी मान्यताओं को मानते हैं, जिनमें सबसे बड़ा नियम यह है कि सूर्यास्त के बाद गांव के जंगल में जाना पूरी तरह वर्जित है। शहर का पढ़ा-लिखा ऋषि इसे महज अंधविश्वास मानता है।
कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब गांव का ही दीपक (सुनील ग्रोवर) शहर से कनेक्टिविटी के लिए जंगल का कुछ हिस्सा काटकर रास्ता बनाने की कोशिश करता है। गांव वाले इसका कड़ा विरोध करते हैं, लेकिन ऋषि भी अपनी जमीन बेचना चाहता है। विकास और पुरानी मान्यताओं के इस टकराव के बीच ऋषि सूर्यास्त के बाद जंगल में चला जाता है और फिर उसका सामना ऐसे रहस्यों से होता है जो उसकी कल्पना से परे हैं।
फिल्म का रिव्यू
फिल्म का फर्स्ट हाफ परिवार, प्रकृति और पुरानी मान्यताओं की पृष्ठभूमि को स्थापित करने में थोड़ा समय लेता है, लेकिन दर्शक कहानी से जुड़े रहते हैं। सच्ची घटनाओं से प्रेरित होने के कारण यह उत्सुकता बनी रहती है कि जंगल में सूर्यास्त के बाद क्या होता है। हालांकि, सेकंड हाफ में जब रहस्यों से पर्दा उठना शुरू होता है, तो स्क्रीनप्ले अपनी पकड़ खोने लगता है।
फर्स्ट हाफ की सहजता के मुकाबले सेकंड हाफ काफी बिखरा हुआ लगता है। विकास बनाम अंधविश्वास के बीच मानवीय लालच का एंगल दिलचस्प है, लेकिन इसे और बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था। मनु आनंद की सिनेमैटोग्राफी जंगल के रहस्य को प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारती है, लेकिन फिल्म के सेट डिजाइन पर और मेहनत की जरूरत थी। रहस्यमयी बाघ, बैल और देवी के VFX सीक्वेंस कुछ जगहों पर अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन क्लाइमैक्स में देवी की स्थापना से जुड़ी बैकस्टोरी कमजोर और दूर की कौड़ी लगती है, जिससे फिल्म का अंत थोड़ा फीका रह जाता है।
अभिनय (Acting Performance)
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की जोड़ी पर्दे पर बेहद फ्रेश और केमिस्ट्री से भरपूर नजर आती है। सिद्धार्थ ने एक पढ़े-लिखे शहरी लड़के से आस्था की ओर मुड़ने वाले युवक का किरदार मजबूती से निभाया है। तमन्ना भाटिया अपने सहज अभिनय से कहानी को एक इमोशनल गहराई देती हैं।
नेगेटिव रोल में सुनील ग्रोवर ने अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन किया है। अनूप सोनी और श्वेता तिवारी ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। ब्लॉगर के रूप में मनीष पॉल और सुलभा आर्या अपने कॉमिक ट्रैक से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।
म्यूजिक (Music)
म्यूजिक की बात करें तो कई संगीतकारों की मौजूदगी के बावजूद ‘समझो ना’, ‘ठुमक ठुमक’ और ‘छठी मैया’ जैसे गाने कर्णप्रिय बन पड़े हैं, हालांकि छठ पूजा वाले हिस्से को कहानी में ज्यादा विस्तार नहीं मिल पाया।
क्यों देखें?
अगर आप हॉरर-कॉमेडी जॉनर के फैन हैं और सिद्धार्थ मल्होत्रा व तमन्ना भाटिया की फ्रेश जोड़ी को पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो एक अच्छे कॉन्सेप्ट और दिलचस्प विचारों के लिए इसे ‘वन टाइम वॉच’ के तौर पर देख सकते हैं। असमान स्क्रीनप्ले के बावजूद यह आपका मनोरंजन करने का प्रयास करती है।

