संभल की 4 सीटों का गणित, 2027 से पहले SP-AIMIM की टक्कर पर नजर

Sambhal
गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वे के दौरान भड़की हिंसा और उसके बाद आई न्यायिक आयोग की रिपोर्ट ने संभल की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले जिले का राजनीतिक परिदृश्य नए सिरे से आकार ले रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पांच में से चार सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज करने वाली समाजवादी पार्टी के सामने अब अपने इस पारंपरिक दुर्ग को बचाए रखने की सीधी चुनौती खड़ी हो गई है।

हालिया घटनाक्रमों में जामा मस्जिद प्रबंध कमेटी से जुड़े और हिंसा के मुकदमों में घिरे एक स्थानीय नेता के असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM में शामिल होने के बाद मुस्लिम वोटों में बिखराव की चर्चा तेज है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी हिंदू मतदाताओं की लामबंदी के जरिए 2017 जैसी सेंधमारी दोहराने की जुगत में जुटी है।

जिले का ताना-बाना: 70 फीसदी तक मुस्लिम आबादी

साल 2011 में मुरादाबाद से अलग होकर बने संभल जिले (शुरुआती नाम भीम नगर) की कुल आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 21 लाख 93 हजार है। 77 प्रतिशत साक्षरता दर और 908 के लिंगानुपात वाले इस जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 60 से 70 प्रतिशत के बीच आंकी गई है। यही सामाजिक बनावट संभल की राजनीति को उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों से अलग रूप देती आई है।

जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं—संभल, असमोली, बिलारी, गुन्नौर और चंदौसी। इनमें चंदौसी सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है, जबकि शेष चार सीटें सामान्य श्रेणी की हैं।

2022 के नतीजे: चार सीटों पर रहा था सपा का कब्जा

पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद संभल जिले में समाजवादी पार्टी का स्पष्ट दबदबा दिखा था। भाजपा केवल एक सीट तक सीमित रह गई थी:

  • संभल सदर: सपा के कद्दावर नेता इकबाल महमूद ने भाजपा के राजेश सिंघल को करीब 42 हजार वोटों के बड़े अंतर से मात दी थी।

  • असमोली: सपा की पिंकी सिंह यादव ने भाजपा प्रत्याशी हरेंद्र कुमार को लगभग 25 हजार वोटों से हराया था।

  • बिलारी: सपा के मोहम्मद फहीम इरफान ने भाजपा के परमेश्वर लाल सैनी के खिलाफ करीब 7,500 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।

  • गुन्नौर: सपा के राम खिलाड़ी सिंह यादव ने जीत हासिल कर सीट पार्टी के खाते में बनाए रखी।

  • चंदौसी (सुरक्षित): भाजपा की गुलाब देवी ने जीत दर्ज की और जिले में पार्टी का एकमात्र खाता खोला।

मुलायम परिवार का प्रभाव और 2017 का अपवाद

संभल का इलाका ऐतिहासिक रूप से समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव परिवार के असर वाला माना जाता रहा है। विशेष रूप से गुन्नौर सीट पर लंबे समय तक यह स्थिति रही कि मुलायम परिवार के समर्थन से प्रत्याशी आसानी से जीत दर्ज करते थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में इस धारणा को झटका लगा था, जब भाजपा के अजीत कुमार यादव उर्फ राजू यादव ने यह सीट सपा से छीन ली थी।

संभल सदर सीट पर भी इकबाल महमूद के जरिए सपा का आधार लगातार मजबूत रहा है। 2017 की प्रचंड लहर में भी संभल की अधिकांश सीटों पर भाजपा जीत दर्ज नहीं कर सकी थी, जिसकी मुख्य वजह यहां का सामाजिक और जनसांख्यिकीय ढांचा रहा।

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट और ओवैसी फैक्टर

जिले के राजनीतिक मिजाज में सबसे बड़ा तनाव नवंबर 2024 में हुए जामा मस्जिद सर्वे के दौरान देखा गया, जिसमें पांच लोगों की मौत हुई थी। मामले की जांच कर रहे न्यायिक आयोग ने अपनी हालिया रिपोर्ट में हिंसा को पूर्व-नियोजित साजिश करार दिया और स्थानीय जनप्रतिनिधियों व नेताओं की भूमिका पर सवाल खड़े किए।

इस तनावपूर्ण पृष्ठभूमि के बीच जामा मस्जिद प्रबंध कमेटी से जुड़े चेहरे के असदुद्दीन ओवैसी के मंच पर जाने और 2027 में चुनाव लड़ने के संकेतों ने नए समीकरण बना दिए हैं। जिले में अब तक सपा को एकमुश्त मिलने वाले मुस्लिम मतदाताओं में यदि AIMIM सेंध लगाती है, तो इसका सीधा असर संभल सदर और बिलारी जैसी सीटों के चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।

पांचों सीटों का सामाजिक समीकरण

  • संभल सदर: मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा और निर्णायक तबका है। इनके अलावा यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की मौजूदगी नतीजों को प्रभावित करती है।

  • चंदौसी (सुरक्षित): दलित मतदाता सबसे प्रभावशाली स्थिति में हैं। यहां सवर्ण हिंदू और मुस्लिम वोटरों की भी अच्छी-खासी तादाद है।

  • बिलारी: मुस्लिम आबादी के साथ-साथ सैनी और अन्य पिछड़ी जातियां जीत-हार तय करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

  • असमोली: यादव और मुस्लिम मतदाताओं का पारंपरिक गठजोड़ यहां चुनावी दिशा तय करता रहा है।

  • गुन्नौर: यादव मतदाताओं की बहुलता वाली सीट है, जहां मुस्लिम आबादी और सहसवान क्षेत्र के मतदाता भी प्रभाव रखते हैं।