पाकिस्तान हाई कमीशन की जमीन किसकी? दूतावास को कितना अधिकार

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साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

नई दिल्ली: नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने राजनयिक परिसरों की जमीन और उनके इस्तेमाल को लेकर बहस छेड़ दी है। इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि जिस जमीन पर पाकिस्तानी मिशन का परिसर मौजूद है, उसका मालिकाना हक किसके पास है और किसी विदेशी दूतावास को उस जमीन पर वास्तव में कौन-कौन से अधिकार मिलते हैं?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चाणक्यपुरी में पाकिस्तान हाई कमीशन को दी गई जमीन का स्वामित्व भारत सरकार के Land and Development Office (L&DO) के पास है। विदेशी मिशनों को ऐसी जमीन आम तौर पर तय शर्तों और दीर्घकालीन लीज व्यवस्था के तहत राजनयिक इस्तेमाल के लिए दी जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित देश उस जमीन का मालिक बन जाता है।

जमीन पाकिस्तान की नहीं, इस्तेमाल का अधिकार

विदेशी दूतावास या हाई कमीशन जिस जमीन पर स्थित होते हैं, वहां उन्हें राजनयिक कामकाज के लिए विशेष अधिकार और संरक्षण प्राप्त होते हैं। लेकिन इससे जमीन पर संबंधित विदेशी देश का संप्रभु मालिकाना हक स्थापित नहीं होता।

चाणक्यपुरी की जमीन भी भारत सरकार की भूमि व्यवस्था के तहत आती है। पाकिस्तान हाई कमीशन को इसका इस्तेमाल राजनयिक मिशन के संचालन के लिए मिला है। इसलिए जमीन के स्वामित्व और परिसर के राजनयिक संरक्षण को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।

यही वजह है कि किसी विदेशी मिशन की जमीन से जुड़े विवाद में पहला सवाल यह नहीं होता कि जमीन ‘पाकिस्तान की’ है या नहीं, बल्कि यह देखा जाता है कि लीज या आवंटन की शर्तें क्या हैं और संबंधित परिसर का इस्तेमाल किन सीमाओं के भीतर किया जा सकता है।

Vienna Convention क्या कहता है?

राजनयिक परिसरों की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आधार 1961 का Vienna Convention on Diplomatic Relations है। इसके अनुच्छेद 22 के तहत मिशन परिसर को विशेष संरक्षण प्राप्त है।

इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मेजबान देश की प्रशासनिक या सुरक्षा एजेंसियां मिशन के परिसर में मिशन प्रमुख की अनुमति के बिना प्रवेश नहीं कर सकतीं। मिशन परिसर को राजनयिक कानून में ‘inviolable’ यानी विशेष रूप से संरक्षित माना गया है।

लेकिन इस सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि दूतावास की जमीन भारत से बाहर कोई अलग संप्रभु क्षेत्र बन जाती है। दूतावास को मिलने वाली diplomatic immunity और जमीन के ownership rights दो अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।

यानी परिसर को विशेष राजनयिक संरक्षण हासिल है, लेकिन इससे उस भूखंड का मालिकाना हक विदेशी सरकार के पास नहीं चला जाता।

फिर बाहर का अतिक्रमण कैसे हट सकता है?

यहीं से पाकिस्तान हाई कमीशन के आसपास हुई कार्रवाई का कानूनी पहलू महत्वपूर्ण हो जाता है। राजनयिक संरक्षण मुख्य रूप से मिशन के मान्यता प्राप्त परिसर पर लागू होता है। अगर कोई निर्माण, बैरिकेडिंग या अन्य ढांचा स्वीकृत सीमा से बाहर सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ या दूसरी सरकारी जमीन पर बनाया गया है, तो मामला सिर्फ राजनयिक परिसर का नहीं रह जाता।

ऐसी स्थिति में प्रशासन को यह देखना होता है कि संबंधित निर्माण या अवरोध के लिए वैध अनुमति है या नहीं और वह किस जमीन पर मौजूद है।

अगर अतिक्रमण सार्वजनिक भूमि पर पाया जाता है, तो उसे हटाने की कार्रवाई स्थानीय कानूनों और प्रशासनिक अधिकारों के तहत की जा सकती है। यही वजह है कि किसी विदेशी मिशन के बाहर मौजूद हर निर्माण को अपने आप ‘दूतावास का हिस्सा’ मान लेना कानूनी तौर पर सही नहीं होगा।

दूतावास को जमीन किन कामों के लिए मिलती है?

भारत में विदेशी मिशनों को आवंटित जमीन का इस्तेमाल उनकी राजनयिक गतिविधियों के लिए तय शर्तों के तहत किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से दूतावास या हाई कमीशन का भवन और मिशन से जुड़े कर्मचारियों के आवास जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं।

कुछ परिस्थितियों में आवंटन की शर्तों के मुताबिक शैक्षणिक संस्थानों जैसी गतिविधियों की भी अनुमति हो सकती है। लेकिन जमीन का इस्तेमाल उस लीज, आवंटन या संबंधित सरकारी समझौते की शर्तों के अनुरूप ही होना चाहिए।

यानी विदेशी मिशन को जमीन मिलने का मतलब यह नहीं कि वह अपनी इच्छा के मुताबिक उस भूखंड का व्यावसायिक या अन्य इस्तेमाल कर सकता है।

क्या दूतावास व्यावसायिक गतिविधि कर सकता है?

Vienna Convention के तहत मिशन के कार्यों का मूल उद्देश्य राजनयिक प्रतिनिधित्व और दोनों देशों के बीच संबंधों से जुड़े आधिकारिक काम हैं। मिशन परिसर का इस्तेमाल स्थानीय नियमों और जमीन के आवंटन की शर्तों के अनुरूप होना चाहिए।

इसलिए किसी विदेशी मिशन द्वारा ऐसी व्यावसायिक गतिविधि करना जो आवंटन या स्थानीय नियमों के खिलाफ हो, उसे सिर्फ राजनयिक दर्जे के आधार पर स्वतः वैध नहीं माना जा सकता।

यही कारण है कि जमीन के इस्तेमाल को लेकर विवाद में लीज डीड, सरकारी आवंटन की शर्तें और संबंधित निर्माण की वास्तविक स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।

सुरक्षा घेरा और अतिक्रमण में फर्क

पाकिस्तान हाई कमीशन से जुड़े मामले में एक और अंतर समझना जरूरी है। राजनयिक सुरक्षा और सार्वजनिक जमीन पर लगाया गया सुरक्षा घेरा एक ही चीज नहीं हैं।

हाई कमीशन के अंदर सुरक्षा व्यवस्था मिशन की सुरक्षा से जुड़ी हो सकती है। लेकिन अगर कोई बैरिकेड, निर्माण या सुरक्षा ढांचा स्वीकृत परिसर से बाहर सार्वजनिक रास्ते को घेरता है, तो उसकी वैधता अलग सवाल बन जाती है।

यानी ‘यह दूतावास की सुरक्षा के लिए है’ कहना अपने आप में सार्वजनिक जमीन के इस्तेमाल की कानूनी अनुमति नहीं बन जाता।

जमीन का मालिक कौन, अधिकार किसका?

पूरे विवाद को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है- मालिकाना हक

जमीन भारत सरकार की भूमि व्यवस्था के अधीन है। पाकिस्तान हाई कमीशन को तय शर्तों के तहत उस जमीन का इस्तेमाल करने का अधिकार प्राप्त है। हाई कमीशन के मान्यता प्राप्त परिसर को Vienna Convention के तहत विशेष संरक्षण हासिल है।

असली विवाद यहीं है

पाकिस्तान हाई कमीशन से जुड़ी मौजूदा कार्रवाई का असली कानूनी सवाल इसलिए यह है कि जिस हिस्से पर कार्रवाई हुई, वह स्वीकृत राजनयिक परिसर के भीतर था या उससे बाहर सार्वजनिक/सरकारी जमीन पर।

अगर वह स्वीकृत सीमा के बाहर का अतिक्रमण था, तो कार्रवाई का आधार जमीन के स्वामित्व और स्थानीय प्रशासनिक कानून होंगे। अगर कार्रवाई मिशन के मान्यता प्राप्त परिसर के भीतर की गई होती, तो Vienna Convention के तहत मामला पूरी तरह अलग कानूनी सवाल खड़ा करता।