सज्जन कुमार की 40 साल लंबी कानूनी कहानी, 1984 दंगों से उम्रकैद तक

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शकील अहमद सैफी
शकील अहमद सैफी

नई दिल्ली: 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। तिहाड़ जेल में सजा काट रहे सज्जन कुमार की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

सज्जन कुमार के खिलाफ 1984 के दंगों से जुड़े मामलों की कानूनी लड़ाई करीब चार दशक तक चली। एक समय दिल्ली की राजनीति में प्रभावशाली कांग्रेस नेता रहे कुमार को पहले निचली अदालत से राहत मिली, लेकिन बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में उनकी कानूनी लड़ाई जारी रही और 2025 में उन्हें दंगों से जुड़े एक दूसरे मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

दिल्ली की राजनीति से संसद तक

सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वह पार्षद रहे और बेकरी का कारोबार करते थे। 1977 में उन्होंने दिल्ली नगर निगम का चुनाव जीता। इसके बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।

1980 में वह कांग्रेस के टिकट पर बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1991 में उन्होंने दोबारा लोकसभा चुनाव जीता। 2004 में भी वह बाहरी दिल्ली से सांसद चुने गए।

उनका राजनीतिक सफर ऐसे दौर में आगे बढ़ा जब दिल्ली में कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी। लेकिन 1984 के दंगों में उनकी भूमिका के आरोपों ने आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन पर गहरा असर डाला।

1984 के दंगों में क्या था आरोप?

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी। दिल्ली में बड़ी संख्या में सिखों की हत्या की गई।

सज्जन कुमार पर आरोप लगा कि उन्होंने हिंसा के दौरान भीड़ को उकसाया और कुछ इलाकों में दंगाइयों को संरक्षण दिया। उनके खिलाफ सुल्तानपुरी, दिल्ली कैंट और दूसरे इलाकों में हिंसा से जुड़े आरोप सामने आए।

इन आरोपों को लेकर लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही। मानवाधिकार संगठनों की तथ्य-जांच रिपोर्टों में भी सज्जन कुमार की कथित भूमिका का उल्लेख किया गया था। हालांकि, शुरुआती वर्षों में उनके खिलाफ मुकदमों में निर्णायक कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकी।

मामला CBI तक कैसे पहुंचा?

दंगों में उनकी भूमिका की जांच पहले दिल्ली पुलिस ने की। बाद में न्यायमूर्ति जीटी नानावती आयोग की सिफारिशों के आधार पर मामला CBI को सौंपा गया।

CBI ने आरोप लगाया कि सज्जन कुमार और अन्य लोगों ने गवाहों के बयानों को प्रभावित करने तथा मामले में अपना नाम हटवाने के लिए पुलिस के साथ साजिश की थी।

2010 में उनके खिलाफ हत्या, दंगा, आपराधिक साजिश और हिंसा भड़काने समेत कई आरोप तय किए गए। लेकिन 2013 में निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद CBI ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।

2018 में पलटा फैसला

इस मामले में सबसे बड़ा कानूनी मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई।

इसके अगले ही दिन सज्जन कुमार ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनकी अपील के दौरान जमानत की कई कोशिशें भी हुईं, लेकिन वह जेल से बाहर नहीं आ सके।

2025 में दूसरे मामले में भी उम्रकैद

1984 दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी सज्जन कुमार को बाद के वर्षों में कानूनी सजा का सामना करना पड़ा। 12 फरवरी 2025 को दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें नवंबर 1984 में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुंदीप सिंह की हत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, दोनों की भीड़ ने हत्या की थी और उन पर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया था।

इस मामले में 14 चश्मदीदों ने सज्जन कुमार के खिलाफ गवाही दी। 25 फरवरी 2025 को विशेष अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई।

अदालत ने शिकायतकर्ता की ओर से मांगी गई मृत्युदंड की सजा को स्वीकार नहीं किया और उम्रकैद का फैसला दिया।