गब्बर से पहले जब्बार का खौफ! धर्मेंद्र की ‘मेरा गाँव मेरा देश’ के अनसुने किस्से

साल 1971 में आई फिल्म मेरा गाँव मेरा देश को बनाने का आइडिया निर्देशक राज खोसला को अखबार की एक सच्ची खबर से आया था।
दरअसल 1960 के दशक में भारत के चंबल और ग्रामीण इलाक़ों में डाकुओं का बड़ा आतंक हुआ करता था, एक दिन फ़िल्म के निर्देशक राज खोसला अखबार पढ़ रहे थे..
उसी दौरान उनकी नजर एक ऐसी खबर पर पड़ी, जिसने उनका ध्यान खींचा। खबर ये थी कि डाकुओं के डर से भागने या सरेंडर करने के बजाय, गांव के लोगों ने एकजुट होकर खुद डाकुओं से मुकाबला करने का फैसला किया था।
इस खबर से राज खोसला को एक नया आईडिया मिला। और उन्होंने हॉलीवुड की वेस्टर्न फिल्मों और जापान की मशहूर फिल्म सेवन सामुराई के स्टाइल को लेकर भारत के गाँव की डाकुओं की कहानी बनाई…
और इसी आइडिया ने आगे चलकर साल 1975 में आई ऐतिहासिक फिल्म शोले भी बनी..
फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद, डाकू जब्बार सिंह के खूंखार रोल के लिए उस दौर के किसी बड़े चेहरे की तलाश थी.. और राज खोसला चाहते थे कि उनका विलेन हैंडसम भी हो और क्रूर भी….तब राज खोसला के करीबी दोस्त और अभिनेता सुनील दत्त ने उन्हें विनोद खन्ना का नाम सुझाया..
सुनील दत्त ने ही विनोद खन्ना को अपनी फिल्म मन का मीत से बॉलीवुड में पहला ब्रेक दिया था और वे उनकी पर्सनैलिटी से वाकिफ थे।
राज खोसला ने सुनील दत्त की सलाह पर विनोद खन्ना का स्क्रीन टेस्ट लिया और उनके लुक्स और एक्टिंग की रेंज देखकर तुरंत फिल्म में कास्ट कर लिया…
इस फिल्म से पहले विनोद खन्ना को इंडस्ट्री में उतनी बड़ी पहचान नहीं मिली थी। लेकिन जब्बार सिंह के रोल ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया और इसके बाद वे हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे विलेन बने, जिन्हें बाद में फिल्मों में बतौर लीड हीरो कास्ट किया जाने लगा…
वहीं लीड रोल अजीत के किरदार के लिए धर्मेंद्र को कास्ट किया गया क्योंकि राज खोसला को एक ऐसे हीरो की जरूरत थी जिसकी कद-काठी मजबूत हो, जो मिट्टी से जुड़ा हुआ लगे और जिसके चेहरे पर एक सीधे-सादे इंसान के भाव हों। चूंकि धर्मेंद्र पंजाब के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखते थे, इसलिए उनका देसी अंदाज इस रोल के लिए सबसे सटीक लगा और कहानी सुनते ही धर्मेंद्र ने भी फ़िल्म के लिए हां कर दिया..
फिल्म को पूरी तरह असली दिखाने के लिए राज खोसला ने स्टूडियो में नकली सेट नहीं बनवाया, बल्कि पूरी स्टारकास्ट को लेकर वे राजस्थान के उदयपुर से थोड़ी दूर स्थित चिरवा गांव पहुंच गए।
वहां धर्मेंद्र ने आलीशान होटलों में रहने से मना कर दिया और दो महीने तक गांव वालों के कच्चे घरों में खटिया पर सोकर वक्त बिताया। वे रोज गांव वालों के साथ देसी खाना और लस्सी का लुत्फ उठाते थे ताकि वे अपने ग्रामीण किरदार को पूरी तरह जी सकें..
धर्मेंद्र का यह जुड़ाव सिर्फ शूटिंग तक ही नहीं रहा। जब फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई, तो धर्मेंद्र ने गांव वालों का प्यार चुकाने के लिए उदयपुर से विशेष रूप से चार लग्जरी बसें चिरवा गांव भेजीं, ताकि पूरा गांव मुफ्त में शहर जाकर फिल्म देख सके। साथ ही उन्होंने सबको लस्सी-आइसक्रीम की शानदार पार्टी भी दी
इस फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को सौंपी गई थी और गानों के बोल लिखे थे मशहूर गीतकार आनंद बख्शी ने।
राज खोसला खुद एक ट्रेन्ड सिंगर थे, इसलिए उन्होंने संगीतकारों के साथ मिलकर गानों को इस तरह तैयार करवाया कि वे सिर्फ मनोरंजन न करें बल्कि फिल्म की कहानी को भी आगे बढ़ाएँ..
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की धुनों और आनंद बख्शी के शब्दों ने मिलकर एक ऐसा जादू रचा कि फिल्म के कुल पांच गाने बनाए गए और पांचों के पांचों ब्लॉकबस्टर साबित हुए। इस एल्बम की सबसे इंटरेस्टिंग बात ये थी कि इसके पांच गानों में से चार गाने अकेले लता मंगेशकर ने गाए थे..
फिल्म के गानों का एक रिकॉर्ड ये भी है कि इसमें केवल एक ही गाना डुएट था….”कुछ कहता है ये सावन”, जिसमें लता मंगेशकर के साथ मोहम्मद रफी साहब की आवाज थी।
इस इकलौते गाने को छोड़कर पूरी फिल्म के किसी भी दूसरे गाने में किसी मेल सिंगर की कोई आवाज़ ही नहीं थी।

फिल्म के गाने सिर्फ रेडियो पर ही नहीं छाए, बल्कि उन्हें पर्दे पर जिस तरह फिल्माया गया उसने भी इतिहास रच दिया।
स्पेशली “मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए” डाकू जब्बार सिंह के अड्डे का एक ऐसा आइकॉनिक डांस नंबर बना, जिसने सिनेमाघरों में तहलका मचा दिया था…
इस गाने से रिलेटेड बचपन ने हमने ऐसे ही एक किस्सा सुना था, जब फ़िल्म नहीं देखी थी..
हमें बताया गया था कि फ़िल्म में ये गाना तब है जब हेमा मालिनी धर्मेंद्र के सर में जूएँ देख रही होती हैं और उन्हें एक मिल जाती है तो वो उसे पकड़कर ये गाना गाती हैं…
बड़े होकर पता चला कि ये एक अफवाह ही थी, क्योंकि फ़िल्म में हेमा जी नहीं आशा पारेख थीं..
इसके अलावा फिल्म के प्रचार के दौरान मेकर्स ने एक अनोखा और रिस्की दांव खेला था। फिल्म के शुरुआती पोस्टर्स पर विलेन विनोद खन्ना को सुपरस्टार धर्मेंद्र को बेल्ट से बांधकर बेरहमी से पीटते हुए दिखाया गया था..
उस दौर में दर्शकों के लिए अपने चहेते हीरो की ऐसी लाचार हालत देखना इतना चौंकाने वाला था कि इसी उत्सुकता में लोग एडवांस बुकिंग के लिए थिएटर्स पर टूट पड़े थे कि धर्मेंद्र कैसे पिट सकते हैं…?
और इस ट्रिक का नतीजा ये हुआ था कि मुंबई के एक सिनेमाघर में यह फिल्म लगातार 189 दिनों तक हर रोज चारों शोज़ में पूरी तरह हाउसफुल चलती रही।
यहाँ तक कि बॉलीवुड फिल्मों में सिक्का उछालकर अपनी किस्मत आजमाने या कोई बड़ा फैसला लेने का जो मशहूर ट्रेंड हम शोले में देखते हैं, उसकी असल शुरुआत भी इसी फिल्म में धर्मेंद्र के किरदार द्वारा की गई थी, जिसने इस विलेज-वेस्टर्न फिल्म को हमेशा के लिए अमर बना..
ख़ास बात-
विनोद खन्ना द्वारा निभाया गया डाकू जब्बार सिंह का किरदार इतना खूंखार और लोकप्रिय हुआ था कि इसी से इन्स्पायर होकर आगे चलकर फिल्म शोले में गब्बर सिंह का किरदार गढ़ा गया था। दोनों फिल्मों के किरदारों के नाम और तौर-तरीके काफी मिलते-जुलते हैं..
शोले फिल्म के लेखक सलीम-जावेद पहले इस फिल्म की रीमेक बनाना चाहते थे, जिसमें वे धर्मेंद्र वाले रोल में बिग बी को लेना चाहते थे। हालांकि, बाद में उन्होंने रीमेक बनाने के बजाय एक नई स्क्रिप्ट लिखी, जो शोले बनी।

