‘लास्ट मैन इन टावर’ रिव्यू: विकास के बीच इंसानियत की गहरी पड़ताल

Last Man in Tower movie review Manoj Bajpayee
शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

मेट्रोपॉलिटन शहरों में बनते-टूटते और आकार लेते कंक्रीट के जंगल आम बात हो चुकी है। पुरानी विरासतों को पीछे छोड़ती गगनचुंबी इमारतों की इस दौड़ के बीच निर्देशक बेन रेखी ने मानवीय विषमताओं और बदलते रिश्तों की एक संवेदनशील कहानी पर पर्दा डाला है। अरविंद अडिगा के चर्चित उपन्यास पर आधारित मनोज बाजपेयी स्टारर फिल्म ‘लास्ट मैन इन टावर’ विकास बनाम विरासत की बहस पर एक गहरा नजरिया पेश करती है।

कहानी: एक इमारत और अपनों से जंग

फिल्म की कहानी मुंबई की एक पुरानी ‘विश्राम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी’ की है, जहां रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक योगेश मिश्रा उर्फ मास्टरजी (मनोज बाजपेयी) के लिए यह इमारत सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी की यादों का दस्तावेज है। बिल्डर धर्मेन शाह (बोमन ईरानी) इस पुरानी सोसायटी को गिराकर एक आलीशान टावर ‘द शंघाई’ बनाने का प्रस्ताव लाता है।

जब बिल्डर सभी को मोटी रकम और बेहतर जिंदगी का सपना दिखाता है, तो बरसों पुराना आपसी सौहार्द और भाईचारा दरकने लगता है। हालांकि, मास्टरजी और कुछ अन्य निवासी अपना घर छोड़ने से इनकार कर देते हैं। धीरे-धीरे दोस्त दुश्मन बन जाते हैं और मास्टरजी अपनी ही सोसायटी में अकेले पड़ जाते हैं। अब यह लड़ाई सिर्फ एक फ्लैट बचाने की नहीं, बल्कि उन यादों और रिश्तों को बचाने की है, जिन्हें पैसों से खरीदा नहीं जा सकता।

अभिनय और निर्देशन

फिल्म में मास्टरजी के किरदार में मनोज बाजपेयी ने एक बार फिर अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है। वे अपने अड़ियल और वैचारिक विद्रोह को बेहद सशक्त ढंग से परदे पर उतारते हैं। वहीं, एक अकेली महिला और दिव्यांग बेटे की मां के रूप में दिव्या दत्ता का अभिनय भी बेहद प्रभावशाली है, जो पहली बार अपने जीवन में एक बेहतर सपने को सच होते देखना चाहती है। बोमन ईरानी ने एक चालाक और महत्वाकांक्षी बिल्डर के रूप में शानदार काम किया है।

निर्देशक बेन रेखी ने कहानी को सहज और सरल तरीके से आगे बढ़ाया है। हालांकि फिल्म का संघर्ष कुछ हद तक व्यक्तिगत दायरों में सिमट कर रह जाता है, लेकिन रंगराजन रामाबद्रन की सिनेमेटोग्राफी और गोविंद वसंथा का संगीत फिल्म के मूल विषय को बखूबी समर्थन देते हैं।

देखें या नहीं?

यथार्थवादी और वैचारिक कहानियों के शौकीन दर्शकों के साथ-साथ मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता की बेहतरीन अदाकारी के लिए यह फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए।

  • क्रिटिक रेटिंग: 3.5/5