अखिलेश के ‘चवन्नी’ तंज पर जयंत का पलटवार, फिर आमने-सामने सपा-RLD

अखिलेश यादव
Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले गठबंधन की राजनीति में बयानबाजी तेज होने लगी है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के 16 अगस्त को दिए ‘चवन्नी’ वाले बयान पर राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी के पलटवार ने सपा और RLD के बीच पुरानी राजनीतिक तल्खी को फिर चर्चा में ला दिया है।

लखनऊ में वीरांगना महारानी अवंती बाई लोधी की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने पुराने सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा था, “हम लोगों ने चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी हमें छोड़कर चले गए।” अखिलेश ने अपने संबोधन में किसी नेता का नाम नहीं लिया था। हालांकि, उनके बयान को जयंत चौधरी और RLD के सपा से अलग होकर भाजपा नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने से जोड़कर देखा गया।

जयंत ने जनता को बताया असली ताकत

अखिलेश यादव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए जयंत चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सब कुछ बनाती और बिगाड़ती है। उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश कभी-कभी ऐसी बातें कह देते हैं, जिनसे उनके सहयोगियों को सोचने पर मजबूर होना पड़ता है।

जयंत की यह टिप्पणी राजनीतिक हलकों में अखिलेश के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले तंज के जवाब के तौर पर देखी जा रही है। हालांकि अखिलेश ने अपने मूल बयान में जयंत का नाम नहीं लिया था।

नंदगांव में RLD कार्यकर्ताओं का विरोध

विवाद के बाद मथुरा के नंदगांव विकासखंड में RLD कार्यकर्ताओं ने अखिलेश यादव के बयान पर नाराजगी जताई। कार्यकर्ताओं ने टिप्पणी को अनुचित बताते हुए विरोध दर्ज कराया।

RLD समर्थकों का कहना है कि राजनीतिक गठबंधन टूट सकते हैं और दलों के बीच मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों से पुराने सहयोगियों के लिए इस तरह की टिप्पणी उचित नहीं है। पार्टी समर्थकों ने इसे जयंत चौधरी की राजनीतिक भूमिका को कमतर दिखाने की कोशिश के रूप में लिया।

RLD के छात्र संगठन ने भी खोला मोर्चा

विवाद का असर RLD के छात्र संगठन तक भी पहुंचा है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, छात्र संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी ‘चवन्नी से रुपया’ टिप्पणी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

RLD की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति और चौधरी चरण सिंह की विरासत का राज्य की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रहा है। ऐसे में जयंत चौधरी पर टिप्पणी को पार्टी कार्यकर्ता राजनीतिक सम्मान के सवाल से जोड़ रहे हैं।

2022 में गठबंधन, 2024 में बदल गया समीकरण

अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के मौजूदा टकराव को समझने के लिए पिछले दो लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समीकरण पर नजर डालना जरूरी है।

2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा और RLD ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। RLD ने 33 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 8 सीटें जीती थीं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। RLD भाजपा नेतृत्व वाले NDA में शामिल हो गई।

यही राजनीतिक बदलाव अब अखिलेश यादव की बयानबाजी के संदर्भ में देखा जा रहा है। ‘चवन्नी’ वाले बयान को RLD ने जयंत चौधरी और उसके NDA में जाने पर कटाक्ष के तौर पर लिया है।

अखिलेश के निशाने पर BJP के सहयोगी भी

अखिलेश यादव की हालिया बयानबाजी केवल RLD तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने भाजपा के सहयोगी दलों की भूमिका और संभावित सीट बंटवारे को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

RLD के लिए 73 और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के लिए 39 सीटों की संभावित चर्चा का दावा सामने आया है। हालांकि, ये फिलहाल राजनीतिक दावे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए इन दलों के बीच ऐसा कोई आधिकारिक सीट बंटवारा घोषित नहीं हुआ है।

पश्चिमी यूपी में क्यों अहम है विवाद?

सपा और RLD के बीच बढ़ती बयानबाजी का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में RLD की किसान और जाट राजनीति से जुड़ी पहचान रही है। 2027 के चुनाव में गठबंधन किस दिशा में जाते हैं और कौन-सा दल किस सामाजिक आधार को अपने साथ जोड़ पाता है, यह पश्चिमी यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों के समीकरण पर असर डाल सकता है।

फिलहाल ‘चवन्नी’ विवाद ने दो पुराने सहयोगियों के बीच बदले राजनीतिक रिश्तों को फिर सामने ला दिया है। 2022 में साथ चुनाव लड़ने वाले अखिलेश और जयंत अब अलग-अलग गठबंधन खेमों में हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले यह बयानबाजी केवल व्यक्तिगत तंज तक सीमित रहती है या गठबंधन की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनती है, यह आगे के राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।